गुरुवार, 12 मई 2016

Story In Hindi Pret Ya Kitab - हिंदी कहानी प्रेत या किताब

Story In Hindi Pret Ya Kitab - हिंदी कहानी प्रेत या किताब: कौन से लोग तुम्हे कब कब, कहाँ कहाँ तलाश रहे होंगे तुम्हे इसका कोई अंदाजा नहीं होगा और कोई अंदाजा होना भी नहीं चाहिए। अगर तुम्हे इस बात का अंदाजा हो जाए की लोग तुम्हे ढूंढ रहे हैं, तुम एक न एक दिन गाहे बगाहे किसी गली नुक्कड़ पर लडकियां घूरते, चाय की दूकान पर चाय पीते। सब्जी की दूकान से मटर खरीदते या फिर किसी दारुखाने में दारु पी के हंगामा करते हुए मिल जाओगे। उनकी तलाश पूरी हो जाएगी और तुम्हारे तलाश में भटकने वाले लोग कम हो जायेंगे।
तुम्हे पता है तुम्हारे खिड़की से ठीक सामने वाला जो घर है न उसमे एक पागल लड़की का प्रेत रहता है। तू विश्वास नहीं करोगे। पर ऐसा लोगो का मानना है। लोगो ने देखा है एक लड़की को उस घर में। छत पर किताबे लिखते हुए। मैंने भी देखा था उसे एक बार, छत की मुंडेर पर औंधी सी बैठी किताबे लिख रही थी। मुझे नहीं पता की वो किताबे क्यूँ लिखती है पर इतना जरुर पता है की अबतक उसने इतनी सारी किताबें तो जरुर लिख ली होंगी जितनी तुम्हारे घर की लाइब्रेरी में होंगी।किताबें लिखने के लिए प्रेत होना जरुरी होता होगा शायद।
"चाय में कितनी शक्कर होनी चाहिए?"
"एक चम्मच?"
"दो चम्मच?"
"तीन चम्मच"
दाल में कितनी नमक होनी चाहिए।
एक चुटकी?
दो चुटकी?
तीन चुटकी?


तुम्हारे बसते में कितनी किताबें होनी चाहिए ?
एक किताब?
दो किताब?
तीन किताब?
सौ किताब?
जीवन में कितना प्यार जरुरी है?
एक किलो?
दो किलो?
तीन किलो?
चार किलो?
आंकड़े सब कुछ नाप सकते हैं क्या?
हाँ
तुम कितनी दफा मरे हो?
आंकड़े झूठे होते हैं
लोग जलते है। लोग किताबे लिखते हैं। लोग किताबे जलाते हैं।किताबे जलती हैं। किताबे लोगों को जलाती है। लोग किताबों से बाहर जलते है। लोग किताबों के अन्दर जलते हैं। लोग किताब लिखकर जला देते हैं। लोग किताब जलाकर उसकी राख से किताब लिख देते हैं। पहले लोग लोग थे किताबे किताब थी। लोग अब किताब हो चुके हैं, किताब अब लोग हो चुकी है
।बड़ी बड़ी लाइब्रेरीयों में बहुत सारे लोग काट रहे हैं अज्ञात वास किताबों के रूप में ।
पागल लड़की का प्रेत लिखता है किताबें । पर तुम्हारे घर में कोई खिड़की नहीं है। वो आईना है। जहाँ से दिखता है पागल लड़की का एक प्रेत किताबे लिखते हुए। तूम आदमी नही हो। प्रेत नही हो। तुम क्या हो।तुम किताब हो क्या। मैं प्रेत हूँ क्या। ये सब सपना है क्या ? हम पागल हैं क्या ?
गुम हो जाने वाले लोग क्या बनते होंगे?
प्रेत या किताब


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(C) Arahaan

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

आईये रातों को सिराहने पे रख कर दीवारों पर सुबह रंग दे. ये सोच कर की ये दुनिया सच्ची नहीं है, वास्तविक नहीं है. हम दस मंजिले से कूद जाए. अपने शरीर से बहते हुए खून और उखड़ती साँसों को धोखेबाज कहते हुए हम सबको गन्दी गालियां दे. ऊपर पूल पर फर्राटे से भागती मेट्रो रेल में, बैठे लोगो की घर पहुँचने की जल्दबाजी, ईंट के टुकड़े रगड़ कर लिख दे. दो मिनट दुनिया को पॉज कर के, सबके घर में ताले लगा दें. इन तालों की सारी चाभियाँ नालों में फेंक दें. किसी सीसी टीवी कैमरे की फूटेज में किसी को चूमते हुए नजर आये और किसी बड़ी सोसाइटी के वाचमैन बन लड़कियों को घूरें. एक ठंडी चाय पीते हुए हम कॉलेज जाने वाले, नौकरी करने वाले, प्यार में पड़ने वाले गिरगिटों पर उपन्यास लिखें.  प्रेमिकाओं की आँखों से बारीकी से प्रेम निकालने का हुनर सीखे. आईये ये मान कर  की हम एक इच्छाधारी नाग है, हम सबकी शराब जूठी करते जाए. लाशों की जेब से पैसे चुराकर, हम मीठे हथियार खरीदें और  कब्रिस्तान में दफ़न बच्चों को बाँटें. किसी न्यूज़ चैनेल में लाइव इंटरव्यू देते हुए, सुन्दर एंकर के नाक पे घूंसे मारकर, मुस्कुराते हुए पूछे "आपको कैसा लग रहा है". आइए हम सभ्य समाज में थोड़ा सभ्य बने. आईये हम अपनी जेब का आखिरी नोट एक झूठ बोलते हुए बच्चे को दे दें और पैदल १५ किलोमीटर चल कर घर पहुंचे. आईये अपनी अच्छाई को गालियां देते हुए अपराध करें. आईये एकदिन सोशल एक्सपेरिमेंट करते हुए अपने अंदर के शैतान को जगा लें और राम का लिबास पहनकर रावणों के पुतले जलाएं. आईये एक दिन थोड़ा सा पागल होकर, सड़कों पे चिल्लाएं, भीड़ जुटाएँ, नारे लगाएं और बेहोश कर मर जाएँ. पागलों के सबसे बड़े भगवान के कहा है की उस पार की दुनिया बहुत खूबसूरत है. 

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

इंतजार

उसने अपनी डायरी में कई दफा लिखा है की उसे इंतजार करना पसंद नहीं. उसे इतंजार करने से इतनी चिढ है की अगर इंतजार करना किसी व्यक्ति का नाम होता तो वो उसे दस तल्ले से नीचे धकेल देता या फिर उसकी आँखों में मिर्च उड़ेल देता. लेकिन वो उस दिन पहली बार उस कॉफी हाउस की मेज पर बैठा किसी का इन्तजार कर रहा था. और बार बार सड़क की तरफ देख रहा था.

Photo: tumblr.com


सड़क उस दिन भी किसी शायर के दिल की तरह तमाम तरह के ख़्वाबों के शोर से गूँज रहा था. सड़क पर चलती गाड़ियां, अपने मोबाइल स्क्रीन्स पर गुम हो चुके लोग, उसे किसी नाटक के ख़राब किरदारों की तरह लग रहे थे. उन किरदारों की तरह जिन्हे जबरदस्ती नाटक का हिस्सा बनाया गया हो. वो सड़क पर बस इन्तजार करती हुई लडकियां देखना चाहता था. और शहर के इर्द गिर्द इमारतों में शराब या कॉफी पीते लड़के. कॉफी हाउस में बैठी लड़कियां अपने प्रेमियों पर किसी बात पर झगड़ रही थी. वो एक पल के लिए उन लड़कियों को तमाचे मारकर सामने वाली सड़क पर इन्तजार करने के लिए भेजना चाहता था और उनके साथ बैठे लड़को  को शराब पिलाना चाहता था. उसे रह रह कर मन में अजीब से ख्याल आते. उसे दुनिया भर के रेस्त्राओं में बैठे इन्तजार करती लड़कियों के चेहरे नजर आते. सुनसान बस अड्डो पर बस के इन्तजार में बैठी लडकियां नजर आती. वो झुंझलाता हुआ बैरे को एक और कॉफी लाने का आर्डर देता और फिर सामने मेज पर पड़ी टिश्यू पेपर उठाकर उगते सूरज का चित्र बनाने लगता. उस दिन उसने ५ कॉफी आर्डर किये और फिर मेज से वो टिश्यू पेपर उठाकर चुपचाप सड़क पर निकल आया. सड़क अब भी वैसी ही थी. भागते हुए लोगो की भीड़ वाली. वो उस भीड़ से थोड़ा झुंझला कर सड़क किनारे बैठ गया. उसने अपने पर्स से एक लड़की की तस्वीर निकाली. कुछ देर देखने के बाद उसने वो तस्वीर फिर से पर्स में रख दी. इस बीच पानी की कुछ बूँदें उसके आँखों में डेरा जमा चुकी थी. उसने अपने जेब से वो टिश्यू पेपर निकाली पर आँखें नहीं पोछी. उसने उस टिश्यू पेपर सूरज के नीचे एक बेंच जैसी आकृति बनायीं. फिर एक लड़के जैसी आकृति बेंच पे बैठे हुए बनायी और बूत बन बैठा रहा.
उस रोज शहर के अखबार के एक कोने में एक तस्वीर के साथ शोक सन्देश का इस्तेहार छपा था. इत्तेफ़ाकन इश्तेहार में छपी लड़की की तस्वीर उसके पर्स में रखी लड़की की तस्वीर से हु ब हु मिल रही थी. 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

उजला सा इक आसमान


सामने सिगरेट की एक डिब्बी पड़ी थी, पर वो उसे छू तक नहीं रहा था, चुप चाप आसमान की तरफ देख रहा था। सिगरेट की डिब्बी के ठीक बगल में कुछ कागजो की एक फाइल थी, जिसे कभी वो देखता और किसी सुखी नदी की तरह उदास हो जाता। कभी वो अपने बीस मंजिला फ्लैट के टेरेस पर बैठ कर घंटो आसमान की तरफ देखता था, सिगरेट पीता था। पर उस दिन वो घंटो आसमान को तकता रहा, मानो जैसे बादलों में किसी खोये खजाने का नक्सा तलाश रहा हो या फिर बादलों में उन खंडहरनुमा महलों को ढूंढ रहा हो, जिसे कभी वो अपना घर कहता था। वो कभी आसमान को तकता, कभी सिगरेट की तरफ देखता, कभी छत की मुंडेर पर रेंग रही किसी चींटी को मसल देता और मुस्कुराने लगता। अगले ही पल वो किसी अमावस की रात की तरह उदास और शांत हो जाता।

नीचे की रंगीन दुनिया में भी चींटियों के माफिक लोग मसल दिए जाते थे, बाकी चींटियों के झुण्ड में थोड़ी हलचल होती पर कुछ पल के बाद सब कुछ शांत हो जाता था। चींटियाँ, चींटियों से खरगोश बन जाती और फिर अपने बिलों में दुबक जातीं। उसे दुनिया खिलौने की तरह लगती, जहाँ खिलौने, खिलौनों से खेलते और कागजो पर गणित के कुछ समीकरण, विज्ञानं के कुछ सिद्धांत लिखकर, अपने आप को इंसान घोषित कर लेते। उसे कागजों से नफरत थी, उसका मानना था कागज़ पर सिर्फ कवितायें ही लिखी जानी चाहिए और बेवकूफ लोग कागज पर चोरी, डकैती, लूट, बलात्कार, आत्महत्या की खबरे छाप देते हैं। कागज़ पर किसी का मेडिकल रिपोर्ट छाप देते हैं जिन्हे पढ़ने के बाद कविता लिखने वाले कविता लिखना छोड़ देते हैं। उसे ऐसे इंसानों से भी नफरत थी, जो इंसान होने का दिखावा करने के लिए रंगीन मुस्कुराते मुखौटे खरीदते थे, जिन से उनका सपाट, भावना विहीन चेहरा छिप सके। वो सड़क पर किसी दम तोड़ते इंसान को देखे तो, जेब से कोई काला नक़ाब निकाल, चेहरे पर चढ़ा कर दूर निकल ले। उसे इंसान होने से भी नफरत थी इसलिए वो इंसान नही बना रहना चाहता था।
वो उस दिन घंटो बैठ आसमान को ताकता रहा, बीच बीच में हर एक घंटे पर हू ब हू उसके जैसे दिखने वाला एक लड़का, ठीक उसके जैसे कपडे पहने हुए, उस से कुछ दूरी पर, उसी मुंडेर पर बैठा, एक सिगरेट सुलगाता, आसमान की तरफ तलाश भरी निगाहो से देखता और जोर से रोता फिर एक फाइल से कुछ कागज़ निकाल कर फाड़ता, और कागज़ के टुकड़े हवा में उड़ाकर, मुंडेर से छलांग लगा देता। जब भी उसके जैसे दिखने वाला लड़का छत से छलांग लगाता, वो एक चींटी को मसल कर बहुत देर तक हँसता।

सोमवार, 29 जून 2015

उन दिनों




उन दिनों कुत्ते ज्यादा भौंकते थे रातों में
प्यार के लिए
*शहर के दुकानदार बेच रहे थे 100 रुपये में दो चादर
*चोर उन दिनों माँओं को बताते थे पुलिस की नौकरी के बारे में
*मैट्रिक इंटर के लड़के छतों पर बिना सीढ़ी के चढ़ते हुए गिरा करते थे
*मेडिकल के दुकानों में गर्भनिरोधक गोलियां धड़ल्ले से मांग लेती थी लड़कियां
*उन दिनों कंपनियां माँ के हाथ के खाने के साथ माँ का प्यार भी डब्बो में बेचने लगी थी
*टीवी पे बिगबॉस देख के दरवाजे बन्द कर दिए जाते थे रातों में
उन्ही दिनों जब कुत्ते बहुत भौंका करते थे रातों में
और सौ रुपये में मिलती थी दो चादर
मेडिकल स्टोर से धड़ल्ले मांग लेती थे गर्भनिरोधक गोलियां
प्यार का बाजार बहुत फला फूला
और कुछ लोगो का उठने लगा भरोसा प्यार से

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

अपने हाथो में ले
गिनो
मुट्ठी भर चावल
और हां अबकी बार भी हिसाब गलत करना
बाहर कुछ भूखे बच्चे बैठे हैं
हाथो में थालियां और आँखों में उम्मीद लिए
सुनो, हर बार की तरह
इस बार भी बोल देना एक झूठ
दे देना उन बच्चों को एक दिलासा
मैं भी बैठा हूँ उन बच्चों के बीच
थोड़ा सा भूखा और झुंझलाया सा

बोरवेल में सच का गिरना


दुनिया कह रही थी
"बोरवेल में बच्चा गिरा है"
दुनिया अपने हाथ कमीज में छिपा कर कह रही थी
"हमारे हाथ कटे है"
दुनिया चिल्ला चिल्ला कर उस से कह रही थी
"उतरो नीचे, तुम्हारे पास कमीज नहीं"
"तुम्हारे हाथ दीखते हैं"
वो दुनिया से नही डरता था
दुनिया की परवाह नही थी
पर बच्चे के बारे में सोच कर उतरा
उसे सच्चाई पसंद थी
गहराई पसंद थी
उसे अँधेरे में रौशनी की तलाश पसंद थी
वो उतरा
बोरवेल में उतरता गया
उसे कोई बच्चा ना मिला
पर गहराई में उतरने पर उसे सच्चाई मिली
वो सोचा
दुनिया को गलतफहमी हुयी है
"कोई बच्चा नहीं गिरा है बोरवेल में"
"हाँ पर सच्चाई जरूर दफ़न है इस बोरवेल में"
वो नीचे से चिल्लाया
"यहां कोई बच्चा नहीं है"
वो चिल्लाता रहा
"यहाँ कोई बच्चा नहीं है"
उसकी आवाज टकराती और लौट आती
थक कर जब वो चुप हुआ तो,
उसे दुनिया के चिल्लाने की एक धीमी आवाज सुनाई दी
"बोरवेल में शराबी गिरा है"

भूख

टिन के फूटे कनस्तर में थोड़ा सा आटा है
पेट में बरसो पुरानी भूख है
एक लड़की चुराती है आटा
एक लड़का चुराता है भूख
टिन के उस फूटे कनस्तर में अब भी थोडा सा आटा है
पेट की भूख ने बस ख़ुदकुशी कर ली है

मैं झूठा हूँ, और खुश हूँ

मैं खुश नहीं हूँ
वजहें काफी हो सकती है खुश रहने की

एक बूढी हो चुकी किताब पे जिल्द लगाने से
मुझे मिलनी चाहिए ख़ुशी
पर इस किताब के फटते पन्नों को देख दुःख नही होता
शायद मैंने पतंगे बहुत काटी है
पतंगों की डोर से
पतंगे बनायीं भी बहुत है
किताबे फाड़ के

खुश रहने के लिए बहुत झूठ बोलना चाहता हूँ
पर सच्चाई हर पल गर्भवती हो जाती है
सच्चाई के पेट पे लात मारने के लिए हिम्मत चुराई जाती होगी कहीं
पर मैं चोर नहीं, मैं हत्यारा नहीं
हाँ पर मैं झूठा हूँ
और मैं खुश हूँ

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

लापता गली, गुमशुदा लोग

गली, तीन घर के बाद लापता हो गयी
मोहल्ले के लोग गुमशुदा हो गए
एक लड़की छत पे चढ़ने के बाद कभी उतरी नही
एक लड़के ने आसमान की खुदाई शुरू कर दी
डाकिये उस शहर के पीने लगे शराब
कबूतरों के मांस के साथ
चील कबूतर बन कर आने लगे लड़कियों के छतो पर
और उनकी पायल चुराकर गायब होने लगे आसमान में
आसमान की खुदाई करने वाले लड़का
आसमान में छेद करता गया
आसमान की गहराई में उसे सबसे पहले वो गली मिली
फिर मोहल्ले के गुमशुदा लोग
फिर शहर के कबूतर
कुछ डाकिये
और आखिर में मिली वो लड़की
और एक धक्का

लड़का अब जमीन पे रहता है
और डरता है
आसमान से
डाकियों से
कबूतरों से
चीलों से
लोगो से
और उस लड़की से

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

नौकरी

नवम्बर की उस आवारा शाम को लड़का रोज की तरह पार्क की बेंच पर बैठा था,उस लड़की की इंतजार में, जिस से वो प्यार करता था।दिन भर इधर उधर दफ्तर दर दफ्तर डिग्रीयों की फ़ाइल लेकर मारा मारा फिरने के बाउजूद भी उसे नौकरी नहीं मिली थी। वो रोज शाम की तरह इस शाम को भी पार्क की उस बेंच पर वो उस लड़की का इन्तजार कर रहा था जिसके गोद में सर रखकर वो रोज की कहानी बताता था और अपने आँखों क3 आंसू बहने से पहले ही उसके दुपट्टे में पोंछ लेता था। उस दिन काफी देर हो गयी थी लड़की के आने में। लड़का बेचैनी में पार्क के उस बेंच पर अपना और उस लड़की का नाम उकेर रहा था। तभी दूर से उसे कोई आता हुआ दिखाई दिया, शाम के धुंध में उसे कुछ भी साफ़ नहीं दिखा रहा था। जब वो धुंधली तस्वीर उसके करीब आई तो उसे एक छोटे से बच्चे का चेहरा नजर आया। बच्चा जब सामने आया तब उसने हाथ से एक पैकेट निकाल कर उस लड़के को दिया और तुरंत ही शाम की धुंध में गायब हो गया। लड़के एक पल के लिए चौंक गया फिर उसने अनमने ढंग से उस पैकेट को खोला। पैकेट में कुछ कागज़ लिफाफे थे। जब उसने पहला लिफाफा खोला तो उसमे किसी कंपनी का को दस्तावेज नजर आये। पूरा पढ़ने पर उसे पता चला की वो तो उसी कंपनी का कॉल लेटर था जिस कंपनी में नौकरी के लिए वो आज सुबह सुबह गया था। लड़का बहुत खुश हुआ, उसकी सारी चिंताए दूर हो गयी थी। वो मन ही मन खुश हो रहा था की नौकरी मिलने की खबर सबसे पहले वो उस लड़की को देगा। लड़का इतना खुश था की ख़ुशी में उसने दुसरा लिफाफा नहीं खोला। कुछ देर बाद जब उसके आँखों से सुनहरे भविष्य की धुप हटी तब उसने दूसरा लिफाफा खोला। ये कोई शादी का कार्ड था। पूरी तरह से कार्ड पढ़ने पर वो स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों से आंसू धीरे धीरे रास्ता ढूंढते ढूंढते निकलने लगे। लड़के को उस समय लड़की के दुपट्टे की बहुत ज्यादा जरुरत महसूस हुई। पर उस समय लड़की उसके पास न आ पायी। शाम के उस धुंध में लड़के को एक और अक्स नजर आया। मानो वो अक्स दूर से उस लड़के को देख रहा हो पर पास नाही आ रहा। लड़का पार्क की बेंच से उठकर उस अक्स के करीब जाने लगा पर वो जितना उस परछाई के पीछे जाता परछाई उतने ही दूर जाती रही। और एक समय के बाद परछाई नवंबर की उस धुंधली शाम में न जाने कहाँ खो गयी।

अगले महीने की पहली तारीख लड़के की जिंदगी की एक महत्वपूर्ण तारीख थी। वो दिन लड़के की नौकरी का पहला दिन था और उसी दिन लड़की की शादी उसके कंपनी के मालिक, उसके बॉस से हो रही थी।

घर वापसी

वो गली जिसे भुतहा समझकर लोगो ने अनदेखा कर दिया है कभी उस गली में जाना, वहाँ 11वी क्लास एक लड़का जस का तस बैठा मिलेगा क्लास की पिछली बेंच पर एक लड़की को टुकुर टुकुर ताकते हुए, मुट्ठियों में कागज़ के टुकड़े को भींचे हुए। उस लड़की की शकल तुमसे कितनी मिलती है ये सोच कर तुम चौंकना मत।

वो शहर के आखिरी छोर पे जो एक खंडहर है न कभी तुम उसमे जाना, वहाँ तुम्हे वही लड़का मिलेगा सड़क पर अपनी सायकिल की चेन लगाते हुए, सड़क के उस छोर पर अपने पापा के स्कूटर पर बैठी वो लड़की भी तुमको मिलेगी, उसे कहना लड़का शराब पीने से कभी नहीं मरेगा।

वो जो मेरे घर के पीछे वो रेलवे का यार्ड है न तुम उसमे जाना, वहाँ तुम्हे वही लड़का दिखेगा उसी लड़की के साथ, एक पूल के पर,तुम उनदोनो को बस इतना कहना की पूल से कूद जाना ही उन दोनों के लिए बेहतर है। पूल के दोनों तरफ इंसानों की बस्ती है, मुखौटे वालो इंसानो की बस्ती।

वो जो तुम्हारे घर के पिछवाड़े जो सुखा कुवां है न तुम उसमे झाँक के देखना वहाँ वो लड़का खड़ा है किसी स्टेशन पर, दुनिया से बहुत दूर जाने के लिए, किसी ट्रेन का इन्तजार कर रहा होगा, तुम उस लड़के को बस इतना कहना की वो लड़की उसका इंतजार कर रही है उसी पूल पर जहाँ उस से वो आखिरी बार मिली थी। सुनो तुम एक काम करना दोनों को पूल से धक्का दे देना। और लौट आना हमेशा के लिए मेरे पास उसी पूल के पास सालो पहले जहाँ से हमदोनो कूदे थे।

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

तुम

तुम हो
किसी प्राचीन कालीन शिला पे
किसी अजीब भाषा में लिखे अभिलेख की तरह
जिसे मैं किसी पुरातत्त्ववेत्ता की तरह
समझने की कोशिश करता हूँ 
पर समझ नहीं पाता
मैं तुम्हे मैं रख देना चाहता हूँ
अपने ह्रदय के संग्रहालय में
हमेशा के लिए संभालकर
इस उम्मीद के साथ की
दिल की धड़कने बंद होने से पहले
मैं समझ जाउंगा तुम्हे

आईना

तुम्हारा दायीं तरफ एक बड़ा आईना है 
तुम्हारे बायीं तरफ भी उतना ही बड़ा आईना है 
मान लो तुम्हारे दायीं तरफ के आईने को मैं जिंदगी कहता हूँ 
और बायीं तरफ के आईने को मौत 
अब जरा करीब से देखो दोनों आईने में बारी बारी 
तुम कितनी दफा मरते हो
कितनी दफा जीते हो
जिंदगी नामक आईने में है मौत
मौत नामक आईने में है जिंदगी
और उन्दोनो आईनो में हो तुम खड़े बेवक़ूफ़ की तरह
जिंदगी और मौत को समझने की कोशिस करते हुए
एक भ्रम एक illusion में गहराई तक डूबते हुए

परिया

रात के दो बजे आवारा लड़का बैठा है छत की मुंडेर पर
रोज की तरह फिर से घर छोड़ देने की धमकी देकर
भूखे प्यासे आसमान को ताकते हुए
लड़का आसमान को ताककर
अपने मोबाइल पर गूगल करता है fairies 
जानना चाहता है की कैसी दिखती है परियां
लड़के के 2G मोबाइल पर गूगल सर्च कम्पलीट होने से पहले
बाजू वाले छत से कूद के आती है एक लड़की
हाथो में दो रोटी और सब्जी लिए
उस दिन लड़के को गूगल के सर्च रिजल्ट आने से पहले पता चल जाता है
की कैसी दिखती हैं परियां
परिया भी आम लड़कियों की तरह आती है दुपट्टे ओढकर
सोती रातो में सबसे नजरें बचाकर
बिना पंखो के उड़कर
परिया भूखे पेट सोती हैं
औरो को अपने हिस्से का खाना खिलाकर

कविता


जो तुम्हारे काजल से घुलकर बन गयी स्याही
और लिखने लगी विरह की एक अंतहीन कविता

मैंने यूँ तो चूमा है कई दफा तुम्हारे चेहरे को
पर अफ़सोस उस दिन न छु सके मेरे होठ तुम्हारे आँखों को
अगर उस दिन मैं तुम्हे चूमता तो
शायद मिटा देता अपने होठो से वो विरह की कविता
लिख देता तुम्हारे चेहरे पर मुस्कराहट

देखो ना मैं वक्त के उसी जाल में उलझा
अब तक लिख रहा हूँ कविता
बस जब कभी तुम्हे तुम्हारे चेहरे पर मुस्कराहट लिखा दिखाई दे
मुझे इत्तेलाह करना
मैं उस दिन तोड़ लूँगा अपनी कलम

ऐ चाँद सुन जरा



ओ बीती हुई रातो के बासी चाँद
ज़रा झाँक के देख जमीन पे
क्या उस पागल लड़की ने फिर से जला लिए है अपने हाथ
तारे गिनते हुए
या फिर से किसी टूटते तारे ने, 
तोड़ा है उसकी बंद आँखों में सजता कोई सपना
या फिर से कोई मतवाली हवा
उड़ा ले गयी है उसके सारे प्रेम पत्र
और वो ढूंढ रही है कागज़ के गीले टुकड़ो को
हाथो में जुगनू पकड़ कर
ओ जागती रातो के ऊबते पहरेदार
जरा नजरे फेर उसके घर की खिड़की पर
और बता
की क्या अब भी उसकी झील सी आँखें
नम होती है किसी के इन्तजार में
क्या अब भी दौड़ पड़ती है वो दरवाजे की तरफ
हलकी सी आहट पर
क्या अब भी भीगा भीगा सा होता है उसके दुपट्टे का कोना
क्या अब भी उसके आंसू रुस्वा कर जाते हैं उसके काजल को
ओ आसमान के सबसे फरेबी आशिक
जरा बता दे उस पागल लड़की को
की मैं प्रतिक्षण उसकी तरफ बढ़ रहा हूँ
माना हूँ मैं अब भी उस से सैकड़ों प्रकाश वर्ष दूर किसी और आकाशगंगा में
पर देखना एक दिन जरूर टूट की गिर पडूंगा उसके घर के अहाते में
किसी भटके हुए उल्कापिंड की तरह

बेसुध रातों के आवारा नोट्स

यहाँ हंसने के लिए बस अपना चेहरा था 
और सबके माथे पर चिपका था आईना 

रात जब भी खांसते हुए, छाती पे जाते है हाथ 
हथेलिय महसूस करती है पुराने जख्मो के निशान 
शराब में डूबा मन, 
डायरी में लिख देता है की 
पिछली जन्म में मैंने किया था प्यार 
या फिर
मेरी यादाश्त बहुत कमजोर है
याद नहीं हो पाते पांच फोन नंबर
की हर नंबर डायल करने के बाद
प्यार में पागल किसी लड़की का प्रेत कहता है
"डायल किया गया नंबर मौजूद नहीं"

तकिये के नीचे शायद अब उतनी जगह बची नहीं
की दो लोग कर ले आराम बाहों में बाहें डाल कर
रो सके, हंस सके या गा सकें कोई फ़िल्मी गीत
इसलिए पहले जहाँ होते थे
पागल लड़कियों के गुलाबी ख़त
अब वहा नींद की गोलियां बना चुकी है अपनी सरकार

एक दिन गूंगा रहने में क्या जाता है
की जो लड़कियां रुमाल पर कढ़ाई कर के लिखती थी मेरा नाम
अब वो खरगोशों की मौत पर आंसू नहीं बहाती
अब वो नोच लेती है उन खरगोशो के चमड़े से रुई
और कानों में खोसकर बहरी हो जाती हैं

रात चाँद आसमान में उल्टा टंगा दिखाई देता है
वो पागल लड़की फिर से पहने घूम रही है झुमके उलटे कर के
अब उस पागल लड़की को रोना चाहिए
की अब इस से ज्यादा बंजर नही होना चाहिए किसी लड़के का दिल
अब इस तरह सूखने नहीं चाहिए फसले मोहब्बत की
अब इतनी बारिश तो होनी चाहिए की
लबालब भरा रहे किसी शराबी का ग्लास
और वो यूँ ही नशे में पागल होके
लिखता रहे कवितायेँ 

गुरुवार, 15 मई 2014

पर्स

तुम्हारा पर्स 
हाँ तुम्हारा पर्स चोरी हो चूका है 
जिसमे थे कुल ३०० रुपये
एक रेल टिकट:
उस शहर के लिए जहाँ जिन्दा है एक ही शख्स तुम्हारे इंतजार में 
एक बार  का बिल:
जहाँ की शराब अब तक तुम्हे मदहोस नहीं कर पाती 
घर के राशन का लिस्ट:
जिसमे पहले नंबर पे है भूख मारने  की दवा  
एक एटीएम कार्ड: 
जिसका पिन भूल चुके हो तुम 
किसी के घर का पता
जो लिखा है किसी अजीब लिपि में  
एक दवाई  की पर्ची
जिसमे दर्ज थे उन दवाओ के नाम, जिनके इंतजार में एक बूढी औरत खड़ी होगी छत पर 
एक प्रेम पत्र 
जिसकी लिखावट से पता चलता होगा  की कांपे होंगे लिखने वाले के हाथ 
और एक लड़की की तस्वीर 
जिसे देखकर कोई ये नहीं कह सकता की लड़की कभी रोती भी होगी 

बड़े बेवकूफ इंसान हो तुम  
अपनी पूरी दुनिया लेकर घूमते हो पर्स में 
और देखते भी नहीं की इस दुनिया के हर दीवाल, हर बैनर, हर होर्डिंग पर लिखा है 
"चोरो और जेबकतरों से सावधान" 

बुधवार, 14 मई 2014

नाश्ता

 

तुम बड़ी देर से करती हो नाश्ता
हमेशा की तरह
मुझे दरवाजे तक छोड़ के आने के बाद ही,
रखती हो अपने प्लेट में
दो बासी रोटी और एक आचार

मैं रोज की तरह
कुछ देर रुक कर
खिड़की से
चुपके से देखता हूँ मैं तुम्हे
मुस्कुराते हुए
सुखी रोटी को निवाला बनाते हुए 

रोज की तरह मैं नाश्ते के बाद हर रोज खाता हूँ एक कसम
की अगले दिन तुम्हारे प्लेट में नहीं होगी कोई बासी रोटी

लेकिन मैं निगल नहीं पाता हूँ वो एक छोटी सी कसम
एक उलटी में उगल देता हूँ
शायद मुझे पता नहीं
की एक बासी रोटी पचाई जा सकती है
पर एक झूठी कसम नहीं
अरहान