रविवार, 1 जुलाई 2012

ये जरूरी नहीं

ये जरूरी नहीं की हर इंसान करे एक शख्स से ही प्यार
ये भी मुमकिन है की हम एक बार में पड़ें,
एक से ज्यादा लोगों के प्यार में
बराबर करें प्यार अपनी सभी प्रेमिकाओं को
निभाएं उनके वादें
बिना किसी को रुलाये
बिना किसी को दुःख पहुंचाए
बाँटें सभी को अपना वक्त बराबर हिस्सों में
गलत नहीं है कुछ इसमें
अगर हम गौर करें इस बात पर
खुले दिमाग से, ईमानदार होकर
ऊँची कर लें अपनी सोच
और विश्लेषण करें इस बात का
परम्पराओं को ताक पर रखते हुए
हम पायेंगे की कुछ गलत नहीं है इसमें
कोई घटियापन नहीं है
कोई कुंठा नहीं है इसके पीछे
ये एक सच्चाई है जो इस बात से वास्ता रखती है की
"प्यार बांटने से बढता है"

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान"

३० जून २०१२


शनिवार, 12 मई 2012

बचा के रखना ऐ खुदा मेरे लिए एक जगह

मेरे मरने के बाद 
बचा के रखना ऐ खुदा मेरे लिए एक जगह 
स्वर्ग में,  नर्क में या जहां कहीं भी मुमकिन हो सके तुमसे 
बचा कर रखना मेरे लिए एक जगह 
मैं मरने के बाद फिर से भटकना नहीं चाहता 
मैं नहीं चाहता की फिर से थके मेरी आँखें उनकी तलाश में 
ठोकर खाकर गिरुं मैं उनकी गली में 
मैं नहीं चाहता की फिर से देखें मेरी आँखें उनकी बेबसी 
और दुनिया लगाये कहकहे हमारी बर्बादी पर 
मैं नहीं चाहता की,
बेघर होने का अहसास कराये, मुझे मेरा ही घर 
और लगने लगे हर कमरा अनजाना सा 
मैं नहीं चाहता की मुझे बुलाये मेरे ही घर की चौखट अजनबी कहकर 
और मैं निकल पडूं घर की तलाश में 
दो जोड़े सपने बांधकर 
मैं नहीं चाहता की मैं यूँ ही भटकता फिरूं आशियाने की तलाश में 
और मायूस होता रहूँ दरवाजों पर ताला देखकर 
अब रुकना चाहता हूँ 
मैं अब ठहरना चाहता हूँ 

मेरे मरने के बाद 
बचा के रखना ऐ खुदा मेरे लिए एक जगह 
मैं मरने के बाद भी जागना नहीं चाहता 
मैं नहीं चाहता की फिर से कटे मेरी रातें करवटों में 
और वो तांक जाएँ एक सपना 
मेरे चादर की सिलवटों में 
मैं नहीं चाहता की उनकी आहट खलल डाले मेरी नींद में 
ले जाए उनकी पायल की खनक मुझे किसी और ही लोक में 
मैं नहीं चाहता की फिर से कोई आवाज उडाये मेरी नींद 
और मैं होता रहूँ परेशान, छतों के चक्कर काटकर 
मैं नहीं चाहता की कोई फिर से चुरा ले मेरे प्रेमपत्र, मेरी चौकस आँखों को धता बताकर 
और मैं ढूँढता रहूँ इन कागज़ के टुकडों को रातभर 
मैं नहीं चाहता की सोऊ एक कच्ची नींद 
और डेरा जमा ले कोई सपना मेरी पलकों पर 
मैं मरने के बाद सोना चाहता हूँ 
एक मीठी सी आराम वाली नींद 
जिसमे जागने की जरूरत नहीं 

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान"

२१ मई २०१२ 

गुरुवार, 10 मई 2012

हर सपना यहाँ टूट जाता है

पत्थरों की पहुँच हो गयी है आसमान तक
हर सपना यहाँ टूट जाता है

हवाओं में घुल रहा है सियासी जहर
आम आदमी का दम घुट जाता है

अफसरों की जेब में आराम फरमाता है राहत राशि का पैसा
गरीब आदमी यहाँ भी छूट जाता है

इक कोहराम मचने की चाह जन्म लेती है जेहन में
जब सब्र का पैमाना फूट जाता है

दूसरों की भलाई में लगा है 'वो' जब भी
उसका कोई अपना रूठ जाता है

जो भी बनते है 'कर्ण' यहाँ
उनका कवच कुंडल लूट जाता है

ब्रजेश कुमार सिंह "अरहान"





मंगलवार, 8 मई 2012

"एक अच्छा लेखक बनने से पहले हमें एक अच्छा पाठक बनना पड़ता है"

बड़े दिनों से मैं ये सोच रहा था की मुझे भी अब एक ब्लॉग  लिखना चाहिए पर मैं इसी असमंजस में था की मैं लिखूं तो क्या लिखूं, किस विषय पर लिखूं. दिमाग में चल रहे ये विचार मुझे अब तक लिखने से रोके हुए थे पर आज मैंने यह तय कर लिया की बिना व्याकरण, शैली, शिल्प और विषय वस्तु की परवाह किये बगैर जो मन में आएगा लिख डालूँगा.  और इसी लिए मैं आज इस ब्लॉग पोस्ट से पहली बार अपने ब्लॉग में कविता से अलग कुछ लिखने जा रहा हूँ.

बचपन से ही मुझे पत्रिकाएं, कॉमिक्स और उपन्यास पढने का शौक था हालाँकि  उस समय बालहंस, नन्हे सम्राट,
चम्पक, नंदन, नन्हे सम्राट इत्यादि  पत्रिकाएं ही पढने को मिलती थी. कॉमिक्स के नाम पर हम राज कॉमिक्स पढ़ा करते थे, नागराज, डोगा, ध्रुव, फाइटर टोड्स, परमाणु, एन्थोनी, गमराज, भोकाल,  और बांकेलाल ये हमारे चहेते कार्टून चरित्र हुआ करते थे. और उन् दिनों हम इन्ही चरित्रों से प्रभावित होकर हीरो विलेन का खेल भी खेलते थे जिसमे मैं हमेशा विलेन का किरदार निभाता था. उपन्यास की बात करें तो उस समय हमारी पहुँच पिनोकियो, ८० दिनों में विश्व यात्रा, गुलिवर'स ट्रेवेल्स तक ही थी और वो भी हमने इनका हिंदी अनुवाद ही पढ़ा था.  कुछ बड़ा होने पर सुमन सौरभ, क्रिकेट सम्राट, Reader's Disget, इत्यादि पत्रिकाओं के पाठक  बने और पढ़ते पढ़ते लिखने का शौक  भी पाल लिए. मैं उस समय सातवीं कक्षा का छात्र हुआ करता था जब मैंने अपनी पहली कविता लिखी थी. यह घटना मेरे जीवन की एक क्रांतिकारी घटना थी. जिसके प्रभाव ने से हम इतने प्रभावित हुए की आगे चलकर कवि बनने का सपना पल लिए. लेकिन जब कुछ बड़े हुए और जब पता चला की कविता किस चिड़िया का नाम है तब हमको आटे दाल का भाव मालूम चल गया और हम दिल से कवि बनने का ख़याल निकाल दिए, लेकिन कविता और साहित्य में रूचि बनी रही. लिखने का क्रम अब  भी जारी है पर सर से कवि बनने का भुत काफी हद तक उतर चुका है. अब ज्यादा समय पढ़ने में बितता हैं.

"एक  अच्छा लेखक  बनने से पहले हमें एक अच्छा पाठक बनना पड़ता है"

अरहान 

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

सपने

मैं सपने देखता हूँ 
हाँ मैं भी सपने देखता हूँ 
कभी जागते हुए कभी सोते हुए 
कभी पर्वतों से ऊंचे  सपने 
कभी गुलाब से हसीं सपने 
कभी खुद को समझने के सपने 
कभी खुद को जीतने के सपने 
कभी खुद को हारने के सपने 
मैं हर तरह के सपने देखता हूँ 
मैं हर रंग हर आकार हर हर स्वाद के सपने देखता हूँ 
कभी नीले कभी गुलाबी कभी
कभी तीखे कभी मीठे  
कभी छोटे  कभी बड़े  
मैं हर तरह के सपने देखता हूँ

मेरे सपने बहूत जल्दी टूट टूटे हैं
और बिखर जाते हैं
मेरे सपने कांच की तरह होते हैं 
एकदम साफ़ और पारदर्शी 
दिख जाते है सबको मेरे सपने 
मैं छिपाकर नहीं रख पाता इनको 
इसलिए लोग खेलने लगते हैं इनसे 
और टूट जाते हैं मेरे सपने खेल खेल में 
मैं कोशिश करता हूँ इन्हें   फिर से सजाने की 
पर चुभ जाते हैं मेरे ही सपनो के महीन टूकड़े 
और मैं दर्द से तड़पता रहता हूँ 

मुझे  अफ़सोस नहीं होता 
जब ये सपने टूटते  हैं 
अब आदत हो गयी हैं इनके टूटने की 
अब तो अधूरा सा लगता है 
जब नहीं  टूटता  है कोई सपना
मन व्याकुल हो जाता है जब नहीं मिलता है सुनने को वो आवाज
जो पैदा होती है इनके टूटने पर

मैं हर वक़्त सपने देखता हूँ
मैं देखना चाहता हूँ उन चीजों को सपनो में 
जिन्हें मैं हकीकत में चाह कर भी नहीं देख सकता 

मैं सपनो में तितलियों को देखता हूँ 
रंग बिरंगी, अनगिनत तितलियों को 
पता नहीं कहाँ से आती हैं ये तितलियाँ 
और फिर भरने लगती है रंग मेरी कोरी ज़िन्दगी में 
पर अचानक! एक एक कर मरने लगती हैं ये तितलियाँ 
और दब जाती हैं मेरी ज़िन्दगी इनकी लाशों तले
और टूट जाता है मेरा सपना रंगों का 
ज़िन्दगी रह जाती है यूँ हीं श्वेत श्याम 

मैं देखता हूँ सपनों में खुद को 
एक निर्जन टापू पर 
बेतहाशा दौड़ते हुए 
कुछ ढूंढते हुए 
मुझे दिखाई देता है सपने में 
मेरा झून्झालाया सा चेहरा 
मुझे दिखाई देती है एक प्यास मेरी आँखों  में
तभी दिखता है दूर  मुझे एक जहाज 
और मैं चिल्लाता हूँ 
खुश  हो जाता हूँ की
आ रहा है एक  जहाज 
जो मुझे ले जाएगा मुझे अपने घर तक 
लेकिन डूब जाता है ये जहाज 
मेरे पास पहुँचने से पहले 
और एक चीख के साथ टूट जाता है मेरा सपना

इसी तरह क्रम  जारी है सपने सजाने का 
और टूटने का
लेकिन मैं सजाता रहूँगा सपने 
और पूरा  भी करूंगा 
क्यूंकि अभी तक किसी सपने में 
दबी है मेरी ज़िन्दगी 
उन तितलियों के लाशों तले 
रंग भरना है ज़िन्दगी में 
इसलिए मैं सपने देखूंगा 
मैं देखूंगा सपने 
और पूरा भी करूंगा 
क्यूंकि मैं अबतक भटक रहा हूँ
उसी निर्जन टापू पर 
एक जहाज के इंतज़ार में
मुझे पहुंचना है घर तक
मुझे करना है  है  सपना 



ब्रजेश सिंह

सर्वाधिकार सुरक्षित 
२०११ 

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

एक गजल



दूर आसमान में जंवा हो रहा एक चाँद
इधर जिंदगी का सूरज ढलता जा रहा है

कोई इत्तेलाह उन्हें भी कर दे की 
उनको पाने का ख्वाब दिल में पलता जा रहा है

हम इसी फिराक में हैं की शाम ढलने से पहले घर को जाएँ
इधर वक्त का पहिया बढ़ता ही जा रहा है

खुद को बनाने की कोशिश है कैसी
जो सबकुछ अपना बिगडता जा रहा है

हम अपनी बात उसे बताएं कैसे
वो अपनी ही कहानी कहता जा रहा है

उसको पुकार रहें हैं हम कितनी देर से
 वो है की अपनी धुन में चलता जा रहा है

ऊपर आसमान बाहें फैलाये खडा है
पंक्षी पिंजड़े में तडपता जा रहा है

कोई खोल क्यूँ नहीं देता ये पिंजडा
पंक्षी के दिल में बगावत का शोला भडकता  जा रहा है

अब नहीं याद आते है दादी नानी के किस्से
जवानी की दहलीज में बचपन बिछड़ता ही  जा रहा है

ढल जायेगा सूरज यूँ ही, रास्ता दिखा दे उसे अरहान
मंजिल की तलाश में मुसफोर भटकता ही जा रहा है

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान'


गुरुवार, 3 मार्च 2011

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई
फिर क्यूँ होता है ये दंगा फसाद 
मासूमों के जीवन में क्यूँ आता है अवसाद 
क्यूँ रक्तरंजित हो जाती है तलवार 
क्यूँ ये करते हैं एकदूजे पे वार 
क्यूँ तोड़ी जाती हैं मंदिर की दीवारें 
क्यूँ गिराई जाती है मस्जिद की मीनारें 
क्यूँ चली थीं सन ८४ में नफरत की हवाएं 
क्यूँ खून से रंगी थी साडी फिजायें 
क्यूँ निर्दयता का था हुआ उत्थान 
क्यूँ आस्तित्व में आया खालिस्तान 
क्यूँ धरती का स्वर्ग, बना था नर्क
इंसानों और हैवानों के बीच का मिट गया था फर्क
क्यूँ जले थे लोग गोधरा की आग में 
क्यूँ गा रहे थे लैब कट्टरता के राग में 
क्यूँ लाहोर अमृतसर के बीच चली थी लाशो की रेल 
दूधमूहों के भी सर कलम कर दिए गए 
क्यूँ हुआ धड़ल्ले नृशंसता का खेल 
क्यूँ ये बने एक दूजे के कोप का भाजन 
फिर क्यूँ हुआ इस देश का विभाजन 
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई 
फिर कहे का ये दंगा फसाद 

जिसके हाथ में है सृजन-संहार 
जिसने किया हममें प्राण का संचार 
जो हमें संकटों से बचाता है 
क्या भला उस पे भी संकट आता है 
फिर काहे का ये 'जेहाद' 
फिर काहे का वो धर्म युद्ध है जिसकी बुनियाद 

उपजी इस तबाही से हम अभी तक नहीं उबरे हैं 
बदन के जख्म भर गए पर दिल के अभी तक गहरे हैं 
आँखों से नहीं, आंसूं अब दिल से रिश्ते हैं 
सियासत की चक्की में हम हर पल जो पिसते हैं 
पर इक दिन ऐसा आएगा 
नफरत बदलेगी मोहब्बत में 
घृणा द्वेष सब मिट जायेगा 
तब मिल जूल कर हम रहेंगे और 
और फक्र से कहेंगे 
की हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई 

ब्रजेश सिंह 
तारीख: १३ जनवरी २००८