मुझे नहीं पता है भौतिकी के सिद्धांतो के बारे में
ना ही मुझे विज्ञान की थोड़ी सी भी समझ है
ना ही मैं न्यूटन हूँ
ना ही आइंस्टीन फिर
पर फिर भी मैं
अपने छोटे से तंग अँधेरे कमरे में
तुम्हारे जुल्फों से रात बना सकता हूँ
तुम्हारे चेहरे से चाँद बना सकता हूँ
तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखों से
टिमटिमाते सितारे बना सकता हूँ
तुम्हारे सुर्ख गुलाबी होठों से
फूल बना सकता हूँ
है मुझमे इतनी काबिलियत की मैं तुम्हारे स्पर्श से
एक नया संसार बना सकता हूँ
ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें