हमलोग जेल की दीवारों पर
लिखते रहे खून से आजादी की कवितायेँ
जेल के रोशनदान से भेजते रहे
आजाद हवाओ को प्रेमपत्र
हाथो में जडी लोहे की बेड़ियों से भी की हमने
अपने आजाद दिनों की बाते
दीवाल पर रेंगती छिपकलियों को भी हमने बताया
की 6X 8 के इस तंग कमरे में भी ढूंढा जा सकता है एक आजाद कोना
एक अपना कोना जहाँ हम गुलाम होते हुए भी जाता सकते हैं अपना स्वमित्व
जी सकते हैं एक बादशाह की तरह इस काल कोठरी में
हम लोगो बीस साल जेल में कैद नहीं थे
यूँ कहें तो हम लोगो ने जिया था उन बीस सालो को
एक आजाद पंछी की तरह
अराहान
26 दिसंबर 2012
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