शनिवार, 22 जून 2013

जलपरी

वो आसमान में उड़ने वाली परी थी
उसे मुझसे प्यार हुआ
वो मेरी ज़िन्दगी में आ गयी
कुर्बान कर दिए उसने अपने पंख मेरे खातिर
छोड़ दिया उसने आसमान के बारे में सोचना
बस गयी मेरे संग जमीन पर
पर हर परियों की कहानी की तरह
वो हमेशा के लिए खुश ना रह पाई
एक दिन उसे जुदा होना पडा मुझसे
उसे भटकना पडा मेरी तलाश में
और भटकते भटकते वो एक समंदर में डूब गयी
पर वो मरी नहीं जलपरी बन गयी
सुना है वो अब भी रोती है मेरी याद में
इसलिए समंदर का पानी खरा होता है

अरहान

एश ट्रे

मेरे ख्वाब
मेरे सपने
मेरी दुनिया
उसकी यादें
उसकी बातें
अब सबकुछ यहीं रहा करती है
इस एश ट्रे में
सुलगती हुयी
सिगरेट के जले बुझे टुकड़ों के साथ

अराहान


थोड़ी सी जगह दे दो अपनी बाहों में

थोड़ी सी जगह दे दो अपनी बाहों में
लिपट कर तुमसे रोना है मुझे

पा लिया है सबकुछ तुम्हे पाकर
अब अपना सब कुछ तुम पर खोना है मुझे

टूट गए थे जो सपने तुमसे जुदा होकर
तुम्हारे आँखों से उन सपनों को अब संजोना है मुझे

रो लेने दो मुझे तुमसे लिपट कर
आंसुओं से अपने जख्मों को धोना है मुझे

रूठ जाने दो सावन को मुझे उस से क्या लेना देना
अब तुम्हारे मोहब्बत की बारिश में खुद को भिगोना है मुझे

काट ली है हमने वो बेचैन रातें हिज्र की
तुम्हारे नैनों के समंदर में खुद को डुबोना है मुझे

थोड़ी सी जगह दे दो अपनी बाहों में
लिपट कर तुमसे रोना है मुझे

अराहान 

ना फिर इधर उधर जवाब की तलाश में

ना फिर इधर उधर जवाब की तलाश में
कभी खुद से भी कुछ सवाल कर

जररी नहीं हर चीज को दिमाग से तौलना
कभी कभी अपने दिल का भी इस्तेमाल  कर

चीख चीख कर करता है चैन-ओ-सुकून की बाते
पहले अपने दिल में अमन बहाल कर

चल कर ले अपना सीना छलनी सच्चाई के तीरों से
और झूठ के महलों में रहनेवालों का जीना मुहाल कर

लोग तुझे जहन्नुम से भी खिंच लेंगे अराहान
पहले तू अपने नाम का जर्रा जर्रा बेमिशाल कर

अराहान 

अच्छा लगेगा

अपने अश्कों में तुमने छिपा रखा है अपना दर्द
कभी रो भी लो अच्छा लगेगा

तुम वक़्त के हाशिये पर लिखते हो अपनी कहानी
कभी वक़्त के साथ चलकर देखो अच्छा लगेगा

तुम पूछा करते हो उनसे अपने बारे में
कभी खुद से करो सवाल, अच्छा लगेगा

कितना खोया है तुमने पाने की कोशिश में
एक दफा बिछड़ों से गले लगाकर देखो, अच्छा लगेगा

ये किसके जाने का है मातम जो संजीदा हो
भुलाकर सबकुछ मुस्कुराकर देखो, अच्छा लगेगा

ज़माने में है और भी लोग किस्मत के मारे जो जीते हैं शान से
अंदाज उनलोगों का अपनाकर देखो अच्छा लगेगा

कुछ तुमको भी है दर्द, कुछ हमको भी है अराहान
आओ हमसे अपना दर्द बाँट कर देखो, अच्छा लगेगा

अराहान

कुचक्र

किसी बीते हुए काल में
मैं ढूंढ रहा हूँ अपना भविष्य
पिरामिडों में तलाश रहा हूँ
सुनहरे पलों की ममियां
पीले पत्तों से पूछ रहा हूँ
बहारों का बसेरा
मैं समय के एक कुचक्र में बैठा हूँ
और सामने गोल गोल घूम रहा है
सोने का पिंजड़ा

अराहान 

दस साल पहले

अगर मैं अभी अठारह का नहीं होता अट्ठाईस का होता
और तुमसे दस साल पहले प्यार करता तो
शायद हम दोनों के बीच प्यार कुछ ज्यादा ही गाढ़ा होता
तब तुम मुझे हर दस मिनट पर फ़ोन नहीं करती
और ये नहीं पूछती की मैंने तुम्हारे मैसेज का रिप्लाई क्यों नहीं किया
या फिर कभी ये नहीं पूछती की कल रात मैं दो बजे किस से बात कर रहा था
दिन में सौ बार नहीं बजता मेरा फ़ोन,
तुम्हारी आवाज को मुझतक पहुँचाने के लिए
शक का मैला पानी नहीं लगा पाता  दाग हमारे मोहब्बत के दामन में
तब तुम मुझे महीने में एक बार ख़त लिखती,
आयर ये बताती की मेरे बिना तुम्हारा मन नहीं लग रहा
मिलने का वक़्त मांगती मुझसे
किस शायरी की किताब से उठाकर दो चार शायरियां लिखती
और सत्तर के दशक के किसी नायिका की तरह बिता देती सारा वक़्त
ख़त के जवाब के इंतजार में
तुम्हारे जेहन मी आती ही नहीं तब कोई बेफजूल बात
जिनसे आये दिन तुम छलनी कर देती हो मेरा सीना
आज नजदीकियां हम दोनों को दूर कर रही हैं
पर आज से दस साल पहले दूरिय हमको नजदीक रखतीं

अराहान