मंगलवार, 18 मार्च 2014

तेरी यादें

आज भी झीने से उतर के 
चली आती है कमरे में तेरी यादें 
बिन बुलाये जुगनुओं की तरह 
अँधेरे में चमकती हुयी 
उतार देती है दीवारों पे 
गुजरे जमाने की कुछ धुंधली तस्वीरें 
कुछ बासी पलों की 
उखड़ी उखड़ी से लकीरे 
जिनमे से झांकती है एक गोरी सी लड़की 
अपनी नम आँखों से मुझे देखती है 
और हर बार पूछती है
रेलवे की पटरियां
अक्सर लोगो जुदा क्यूँ करती है
शहर से दूर जाने वाली ट्रेनें भी तो वापस लौटती हैं
फिर तुम क्यूँ नहीं लौटे अबतक
मैं कुछ बोल नहीं पाता हूँ
बस जेब से उसी लड़की की एक साफ़ तस्वीर निकाल के
देखता हूँ और
रोज की तरह घर से दूर निकल जाता हूँ
कुछ टूटी हुयी रेल की पटरियों को जोड़ने के लिए

अरहान

साँसे फिर चलती नहीं थम जाने के बाद

साँसे फिर चलती नहीं थम जाने के बाद
हम जीते रहे ज़िन्दगी मर जाने के बाद 

ऐसा नही था की जीना नही आता था 
पर भला जी के भी क्या करते 
उनसे दूर हो जाने के बाद

मयखाने में इल्म हुआ की बेहोशी क्या चीज होती है
हमें होश आया मदहोश जाने के बाद 

वाकिफ ना थे वो की आग लगी है हमारे सीने में
जली उनकी साँसे हमारे जल जाने के बाद

ताउम्र जिसके इन्तेजार में रास्ता देखते रहे
वो आया भी करीब तो हमारे दफ़न हो जाने के बाद

अराहान

विंडो सीट

मुझे पता है
ट्रेन की खिड़की से तुम दिखाई नही दोगी
पर हर बार मैं ट्रेन में चुनता हूँ 
एक विंडो सीट 
ताकि मैं देख सकूं बाहर 
पीछे छूटते पेड़ों को 
इमारतों को 
जंगलों को 
हर उस चीज को जो मुझसे छूटती जा रही है
ट्रेन के चलने से 
मुझे महसूस होता है तुम्हारा अक्स
उन हर चीजों में जो मुझसे छुट्ती है
बिछड़ती है
ये महसूस कराती है की मैं तुमसे दूर हूँ बहुत दूर
और मुझे रोक देनी चहिये
दुनिया की सारी ट्रेने
अपने लाल खून से

अराहान

आग दिल में लगी रही

आग दिल में लगी रही
सीना ता उम्र जलता रहा


दूर होता रहा साहिल मुझसे 
ख्वाब दरिया का दिल में पलता रहा


उसको ही बना डाला अपना महबूब दिल ने
जिसकी नजरो में मैं हमेशा खलता रहा 


ख्वाहिश तो थी की कोई थाम ले हाथ जब भी गिरुं 
ठोकरे खाकर खुद गिरता संभलता रहा


सजदे में झुका था मैं भी खुदा के आगे
मुफलिसी का दौर यूँ ही चलता रहा 

जिस पे यकी था की साथ देगा मेरा
वो चेहरे पे चेहरा बदलता रहा

कोई तो होगा जो मेरा होगा अराहान
इसी उम्मीद में दिल ताउम्र बहलता रहा

अराहान

मधुशाला

एक ढलती शाम को 
नहीं उतार सकता मैं कॉफी के मग में 
या फिर सीने का दर्द मैं 
कम नहीं कर सकता चाय के प्याले से 
ये मेरी मज़बूरी है 
या मेरी खुद कि रजामन्दी 
कि हर उदास शाम को 
मधुशाला बुला लेती है 
और मैं ठुकरा नहीं सकता उसका न्योता

पिंटूआ - 3

चिंटूआ उ लड़की के पीछे एतना पागल आ obsessed था की दिन रात ओकरे नाम के माला जपता था। उ ससुरा बगल के नर्सरी से दू तीन दर्जन गुलाब के फूल लाता और छत के छज्जा पर बैठकर She Loves Me, She Loves Me Not कहता और साथ साथ गुलाब के फुल पूरा पंखुड़ी नोच के जियान कर देता।

वहीँ छज्जे के नीचे बैठा पिंटुआ झाड़ू निकाला आ सब फूल को समेट के उस लडकिया के देह पे फेंक दिया आ कहा की ए सुनती हो आई लभ यू । लडकियो इतना ना खुश हो गयी की उ भी कह दी आई लभ यु टू पिंटू।

बेचारा चिंटूआ आजकल दिन भर ऊहे छज्जा पर बैठकर खैनी मलता है और अपना चाइनीज मोबाइल पर फुल साउंड में बेवफाई वाला गाना सुनता है।

अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का यार ने ही लुट लिया घर यार का।




स्टेचू (Statue)

स्टेचू (Statue) 

उसे स्टेचू कह कर मुझसे जीतना अच्छा लगता था। मैं जब उसे डांटता, तो वो मुझे हंस के स्टेचू कहती, और में स्टेचू हो जाता। मैं batting करता वो बोलिंग करती, वो स्टेचू कहती मैं बोल्ड हो जाता। उसे मुझे सताना अच्छा लगता था और मुझे उसका सताना।
अब वो मेरे पास नहीं है, और मैं अब सचमुच का स्टेचू बन चूका हूँ।
मेरी निगाहें हमेशा दरवाजे पर टिकी रहती है , पता नहीं कब वो दरवाजा खोलकर अन्दर आ जाये और अपनी खनकती आवाज में कह दे 

"Okay, Satue Over.