एक ढलती शाम को
नहीं उतार सकता मैं कॉफी के मग में
या फिर सीने का दर्द मैं
कम नहीं कर सकता चाय के प्याले से
ये मेरी मज़बूरी है
या मेरी खुद कि रजामन्दी
कि हर उदास शाम को
मधुशाला बुला लेती है
और मैं ठुकरा नहीं सकता उसका न्योता
नहीं उतार सकता मैं कॉफी के मग में
या फिर सीने का दर्द मैं
कम नहीं कर सकता चाय के प्याले से
ये मेरी मज़बूरी है
या मेरी खुद कि रजामन्दी
कि हर उदास शाम को
मधुशाला बुला लेती है
और मैं ठुकरा नहीं सकता उसका न्योता
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