शनिवार, 22 जून 2013

मरीचिका

नींद से जागी मेरी आँखें
कर रही है पीछा मेरे बेलगाम सपनो का
अमादा है मचाने को एक कोहराम
मेरी आँखें हो रही हैं हलकान दौड़ दौड़कर
इसी भागम भाग में मैं
पता नहीं कब चला आया
यथार्थ के धरातल से कोसों दूर
फंस गया मरीचिकाओं के कंटीलीदार झाड़ियों में
पता नहीं कब और कैसे
चुभ गया एक कांटा मेरी आँखों में
पता नहीं कब और कैसे
गुम  हो गए मेरे सपने

अराहान 

रोटी

उस समय आंदोलन नाम की हवा बह रही थी 
जब वो औरत चूल्हे की भडकती आग पर रोटियां सेंक रही थी 
रह रह कर पार्श्व में सुनती थी लोगो के मूह से 
किसी आचार के मिटाने के बारे में किये गए नारे 
पर उसका सारा ध्यान रोटी पर था और पोटली में रखे गए आचार पर 
जो वो अपने बच्चे को खिलाने वाली थी 
उसके चेहरे पर आया था दुनिया फतह करने जैसा भाव 
जब उसने अपने बच्चे को रोटी थमाई 
बच्चा रोटी लेकर खेलने लगा 
उस बच्चे की तरह के बच्चों को खिलौना नहीं मिलता
इसलिए वो खेलते हैं हाथ में आयी किसी भी चीज से
बच्चा रोटी को दूरबीन बना कर खलेने लगा
शायद वो अपनी माँ को दिखाना चाहता था की
वो उसकी एक रोटी से ही अपनी सारी जरूरतें पूरी कर सकता है
उसकी माँ उसे प्यार से डांटती है
"रोटी खेलने की चीज नहीं"
पर बच्चा गैलीलियो बन चूका था
वो उस रोटी की दूरबीन से वो सब कुछ देखना चाहता था
जो वो रोज चाहर भी नहीं देख पाता
पर बच्चे को उस दूरबीन से दिखाई देते हैं
बड़ी बड़ी गाड़ियों में उसकी तरफ आते कुछ लोग
शायद उसकी रोटी छिनने वाले लोग
बच्चा झट से रोटी खा लेता है
पसर जाती है एक ख़ामोशी थोड़ी देर के लिए
उसके माँ और उसके बीच
जिसे अगले ही पल तोड़ देती है
भीड़ से उठती एक नारे की आवाज
"गरीबो की रोटी मत छीनो"

अरहान 

क़यामत का दिन

जिस तरह जमीन देखती है आसमान की तरफ
और आसमान देखता है जमीन की तरफ
ठीक उसी तरह हम दोनों
एक दुसरे को देखते हैं
दिओन में मिलने का ख्याल पाले हुए
दुनिया भर की तमाम मजबूरियों का मलाल पाले हुये
हम दोनों जानते हैं की
क़यामत से पहले आसमान और जमीन एक नहीं होने वाले
इसलिए हम दोनों इन्तेजार कर रहे हैं
अपनी अपनी छत के मुंडेरों पर बैठकर
कब आएगा क़यामत का वो दिन
जब हम  मिलेंगे
जमीन और आसमान की तरह

अराहान 

One day

One day
We will dine together
in the courtyard of our heart
will feed each other
with our smile
will walk on the green grasses
holding each others hands
covering miles and miles

Arahaan 

दोषी

मैंने तुम्हे भुला दिया है
निकल फेंका है तुमको
अपनी ज़िन्दगी के हर कोने से
अप तुम्हारी खबर नहीं होती है सुर्ख़ियों पर
मेरी ज़िन्दगी के अख़बार में
पर ना जाने क्यूँ कब और कैसे
तुम्हारी यादें
डेरा जमालेती है मेरे सिराहने में
ना जाने कब दोस्ती का लेती हैं मेरे सपनों से
और ना जाने कब आँखों के सामने
उतर आता है तुम्हारा हसीं चेहरा
समझ नहीं आता है की मैं किसे दोषी ठहराऊं
अपने सपनो को
या तुम्हारी यादों को

अरहान 

तुम मत रोना

तुम मत रोना
मेरे मरने पर
मैं मरने के बाद
नहीं देख पाउँगा तुम्हे
पर हाँ जबतक मैं ज़िंदा हूँ
तब तक होती रहना परेशान
मेरी नामौजूदगी पर
मेरी गुमशुदगी पर
मैं तुम्हे खुदको ढूंढते हुए देखूंगा
तो मुझे अच्छा लगेगा

अराहान

सच

मैं झूठ नहीं बोलूँगा
की तुम मेरी पहली प्रेमिका हो
पहली बार मैंने किसी से प्यार किया
या फिर मैं ये भी नहीं बोलूँगा
की मैं तुम्हारे लिए चाँद तोड़ सकता हूँ
समंदर से मोती ला सकता हूँ
इन्द्रधनुस से रंग चुरा सकता हूँ
ना ही मैं तुम्हारे लिए कवितायेँ लिख सकता हूँ
ना ही तुम्हारी खूबसूरती पर कसीदे पढ़ सकता हूँ
बस मैं एक सच कह सकता हूँ
की मैं तुमसे प्यार करता हूँ
और तुम्हारे आंसुओं को तुम्हारे आँखों में आने से पहले
रोक सकता हूँ

अराहन