शनिवार, 22 जून 2013

रोटी

उस समय आंदोलन नाम की हवा बह रही थी 
जब वो औरत चूल्हे की भडकती आग पर रोटियां सेंक रही थी 
रह रह कर पार्श्व में सुनती थी लोगो के मूह से 
किसी आचार के मिटाने के बारे में किये गए नारे 
पर उसका सारा ध्यान रोटी पर था और पोटली में रखे गए आचार पर 
जो वो अपने बच्चे को खिलाने वाली थी 
उसके चेहरे पर आया था दुनिया फतह करने जैसा भाव 
जब उसने अपने बच्चे को रोटी थमाई 
बच्चा रोटी लेकर खेलने लगा 
उस बच्चे की तरह के बच्चों को खिलौना नहीं मिलता
इसलिए वो खेलते हैं हाथ में आयी किसी भी चीज से
बच्चा रोटी को दूरबीन बना कर खलेने लगा
शायद वो अपनी माँ को दिखाना चाहता था की
वो उसकी एक रोटी से ही अपनी सारी जरूरतें पूरी कर सकता है
उसकी माँ उसे प्यार से डांटती है
"रोटी खेलने की चीज नहीं"
पर बच्चा गैलीलियो बन चूका था
वो उस रोटी की दूरबीन से वो सब कुछ देखना चाहता था
जो वो रोज चाहर भी नहीं देख पाता
पर बच्चे को उस दूरबीन से दिखाई देते हैं
बड़ी बड़ी गाड़ियों में उसकी तरफ आते कुछ लोग
शायद उसकी रोटी छिनने वाले लोग
बच्चा झट से रोटी खा लेता है
पसर जाती है एक ख़ामोशी थोड़ी देर के लिए
उसके माँ और उसके बीच
जिसे अगले ही पल तोड़ देती है
भीड़ से उठती एक नारे की आवाज
"गरीबो की रोटी मत छीनो"

अरहान 

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