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अकसर कवितायेँ लिखा करते हैं
रेत पर घरौंदे बनाते हैं
तितलियों का पीछा करते हैं
ओंस इ बूंदों ओ पिने की कोशिश करते हैं
तारे गिना करते हैं
समुन्दर की लहरों पर कागज़ के नाव तैराया करते हैं
सुनसान पर टहला करते हैं
मातम मानते हैं
दर्द भरे नगमे गाते हैं
बेवफाई की कहानियाँ पढते हैं
और इन सब से थकने के बाद
वे फिर से प्रेम करते हैं
और असफल हो जाते हैं
ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान"
10 Aug 2012

3 टिप्पणियां:
सच !!!!!और इस तरह सृजन चलता रहता है....
बहुत खूब...
अनु
Shukriya Anu Jee
nice one......heart touching...
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