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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

विनाश

रक्तरंजीत पड़ी है भूमि 
मृत्यु का ही पाश है
यहाँ वो मर रहा है 
वहां पड़ी उसकी लाश है 
यहाँ इस घोर तिमिर में 
रौशनी का पता नहीं 
शर्वरी का ही वाश है
यही तो विनाश है 

आज लालच लहरों की भाँती उफान पे है 
नैतिकता तो मरी हुयी शमशान में है 
वसुधा को तो जहन्नुम बना ही दिया है 
नजरे अब इनकी आसमान पे है 
मुहरो से घर पड़े है इनके 
फिर भी स्वर्ण की तलाश है 
यही तो विनाश है 

आज बुराई का बोलबाला है 
सच्चाई और अच्छाई को कबका मूक कर डाला है 
रोज लूट हत्या चोरी डकैती होती है 
हैवानियत के ठहाको के बीच इंसानियत रोती है 
सत्य अहिंसा दया इत्यादि का अब किताबों में ही निवास है 
यही तो विनाश है 

ब्रजेश singh
वर्ष २००७

(यह  कविता मैंने दसवीं कक्षा में लिखी थी, तन मेरे लिखना का सिलसिला शुरू ही हुआ था )