रक्तरंजीत पड़ी है भूमि
मृत्यु का ही पाश है
यहाँ वो मर रहा है
वहां पड़ी उसकी लाश है
यहाँ इस घोर तिमिर में
रौशनी का पता नहीं
शर्वरी का ही वाश है
यही तो विनाश है
आज लालच लहरों की भाँती उफान पे है
नैतिकता तो मरी हुयी शमशान में है
वसुधा को तो जहन्नुम बना ही दिया है
नजरे अब इनकी आसमान पे है
मुहरो से घर पड़े है इनके
फिर भी स्वर्ण की तलाश है
यही तो विनाश है
आज बुराई का बोलबाला है
सच्चाई और अच्छाई को कबका मूक कर डाला है
रोज लूट हत्या चोरी डकैती होती है
हैवानियत के ठहाको के बीच इंसानियत रोती है
सत्य अहिंसा दया इत्यादि का अब किताबों में ही निवास है
यही तो विनाश है
ब्रजेश singh
वर्ष २००७
(यह कविता मैंने दसवीं कक्षा में लिखी थी, तन मेरे लिखना का सिलसिला शुरू ही हुआ था )
वर्ष २००७
(यह कविता मैंने दसवीं कक्षा में लिखी थी, तन मेरे लिखना का सिलसिला शुरू ही हुआ था )
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