गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

आजादी

हमलोग जेल की दीवारों पर
लिखते रहे खून से  आजादी की कवितायेँ 
जेल के रोशनदान से भेजते रहे 
आजाद हवाओ को प्रेमपत्र 
हाथो में जडी लोहे की बेड़ियों से भी की हमने 
अपने आजाद दिनों की बाते 
दीवाल पर रेंगती छिपकलियों को भी हमने बताया 
की 6X 8 के इस तंग कमरे में भी ढूंढा जा सकता है एक आजाद कोना 
एक अपना कोना जहाँ हम गुलाम होते हुए भी जाता सकते हैं अपना स्वमित्व 
जी सकते हैं एक बादशाह की तरह इस काल कोठरी में 
हम लोगो बीस साल जेल में कैद नहीं थे 
यूँ कहें तो हम लोगो ने जिया था उन बीस सालो को 
एक आजाद पंछी की तरह 

अराहान 

26 दिसंबर 2012 

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

मेरे रात का एक हिस्सा


कभी तुम चुपके से चुरा लेना
मेरी रात का एक टुकडा
और सो जाना मेरे रात के हिस्से में
तुम्हे पता चलेगा की
चाँद के लाख चमकने के बावजूद भी
मेरी रातें कितनी अँधेरी हैं
चैनो सुकून के सारे साजो सामान के बावजूद भी
कितनी बेचैनी है मेरे रातों में
तुम्हे पता चलेगा की
क्यों मेरी चुप्पी
जलती है मेरी डायरी में
क्यूँ तुम्हारी बाते आते है मेरे शायरी में
क्यूँ मेरी रातों का कोई सवेरा नहीं होता
क्यूँ मेरे ख्वाबों के परिंदों का
कोई बसेरा नहीं होता
क्यूँ मेरे खयालो में तेरा नाम बसता है
क्यूँ हिज्र की आग में मेरा दिल जलता है
कभी तुम चुपके से चुरा लेना
मेरे रात का एक टुकडा
और सो जाना मेरे रात के हिस्से में
तुम्हे पता चलेगा की
तुम्हारे प्रति मेरा पागलपन कितना जायज और लाजिमी है
कितना बेसब्र है मेरे रात का हर एक पल
तुम्हारे बाजुओं में बीतने के लिए

ब्रजेश कुमार सिंह "अरहान"

सृजन


मुझे नहीं पता है भौतिकी के सिद्धांतो के बारे में 
ना ही मुझे विज्ञान की थोड़ी सी भी समझ है 
ना ही मैं न्यूटन हूँ 
ना ही आइंस्टीन फिर
पर फिर भी  मैं 
अपने छोटे से तंग अँधेरे कमरे में 
तुम्हारे जुल्फों से रात बना सकता हूँ 
तुम्हारे चेहरे से चाँद बना सकता हूँ 
तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखों से 
टिमटिमाते सितारे बना सकता हूँ 
तुम्हारे सुर्ख गुलाबी होठों से 
फूल बना सकता हूँ 
है मुझमे इतनी काबिलियत की मैं तुम्हारे स्पर्श से 
एक नया संसार बना सकता हूँ 

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान" 




सोमवार, 13 अगस्त 2012

कोई था

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कोई था जो हमारी शामें गुलजार किया करता था 
कोई था जो दरिया किनारे हमारा इंतज़ार किया करता था 
कोई था जो हम पे अपनी जान भी निसार करता था 
कोई था जो हम से भी प्यार करता था 

कोई था जिसके आने से ख़ुशी लौट आती थी 
कोई था जिसके जाने से आँखें नम हो जाती थी
कोई था जिसका तस्सव्वुर में आना जाना था 
कोई था जिसका ये दिल भी दीवाना था 
कोई था जो छिप चीप के हमारा दीदार किया करता था
कोई था जो हमारी सलामती के लिए अपनी खुशियाँ दरकिनार करता था
कोई था जो हमसे भी प्यार करता था

कोई था जिसका थाम के हाथ हम हर सीढ़ी चढ़ लेते थे
कोई था जिसकी आँखो में हम हर बात पढ़ लेते थें
कोई था जिसके लिए धड़कता था हमारा दिल भी
कोई था जो था हमारा रास्ता भी मंजिल भी
कोई था जो नजरो से हमारे दिल पे वार करता था
कोई था जो हमसे भी प्यार करता था

कोई था जो दिया बन जाता था अँधेरे में
कोई था संग हमारे हर शाम हर सवेरे में
कोई था संग हमारे सावन की घटा, वसंत की पुरवाई में
कोई था संग हम में हमारी परछाई में
कोई था जो हमको 'दूरियो से दूर बार बार किया करता था
कोई था जो हमसे भी प्यार करता था

कोई था जिसने संग हमारे खुशियो के बीज बोये थे
कोई था जिसने हमसे जाने कितने सपने संजोये थे
कोई था जिसने हमसे लाल जोड़े की, की अर्जी थी
पर सफ़ेद कफन था उसके नसीब में भगवान् की यही मर्जी थी
कोई था जिसके लिए हम पहली बार टूटे थे
बंद भीतर, दिल के जज्बात आँखों से टूटे थे
कोई था जो हमारे आंसूओं का ऐतबार किया करता था
कोई था जो हमसे भी प्यार करता था

कोई था जिसको ये दिल हर वक़्त याद किया करता है
गम भूलाने के लिए मयखाने आबाद करता है
वो जब भी हमें तनहा पाती हैं
हवाओं के संग पता नहीं कब चली आती है
बादलो और हवाओं में उसके अक्स का ये दिल दीदार करता है
कोई था जिसको ये दिल भी प्यार करता है

अराहान

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

वो लोग जो असफल होते हैं प्रेम में

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वो लोग जो असफल होते हैं प्रेम में 
अकसर कवितायेँ लिखा करते हैं 
रेत पर घरौंदे बनाते हैं 
तितलियों का पीछा करते हैं 
ओंस इ बूंदों ओ पिने की कोशिश करते हैं 
तारे गिना करते हैं 
समुन्दर की लहरों पर कागज़ के नाव तैराया करते हैं 
सुनसान पर टहला करते हैं 
मातम मानते हैं 
दर्द भरे नगमे गाते हैं 
बेवफाई की कहानियाँ पढते हैं 
और इन सब से थकने के बाद 
वे फिर से प्रेम करते हैं 
और असफल हो जाते हैं 

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान"
10 Aug 2012 

रविवार, 5 अगस्त 2012

मेहरुन्निसा क्या वो तुम हो

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मेहरुन्निसा क्या वो तुम हो
चाँद पर बैठी
चरखा कातती हुयी
मेहरुन्निसा क्या वो तुम्ही हो
जो लटका देती है ख्वाबों के रंग का एक पतला सूत
मेरे छत पर
और शायद इन्तजार करती हो मेरा
उसपर लटककर ऊपर आने का
अगर वो तुम्ही हो तो
भेजो कोई मोटी रस्सी
वो सूत का पतला धागा नहीं उठा सकता मेरा वजन
चौंको नहीं, मैं पहले की तरह ही दुबला पतला हूँ '
पर मेरा वजन बढ़ चुका है
मेरी दिल के कोठरियों में दबी उन अनकही बातो के भार से
जिन्हें मैं तुम्हे अक्सर बताने की कोशिश करता था पर बता ना सका
जिन्हें तुम सुन लेती तो,
 यूँ नजर ना आती चाँद पर चरखों से खामोशियों के धागे  कातते हुए
आसमान से नहीं टपकती तुम्हारे रोने की गीली आवाज
मेहरुन्निसा फ़ेंक दो जल्दी से कोई मोटी सी रस्सी
मैं ऊपर आकर तुम्हारे स्पर्श के गुरुत्वाकर्षण से
कम करना चाहता हूँ अपना वजन
बता देना चाहता हूँ वो सब
जिस से तुम अबतक अनजान हो
मेहरुन्निसा मैं तुमसे तबसे मोहब्बत करता हूँ
जब तुम एक कैटरपिलर हुआ करती थी
और मैं उलझा हुआ रहता था तुम्हारे रेशमी धागों में
तुम देखती थी हमेशा मुझे अपने मुस्कराहट की दूरबीन से
और मैं झेंपता था सुलझने की हर नाकामयाब कोशिश पर
मैं उलझा हे रहा उन रेशमी धागों में और
नजाने कब तुम तितली बन कर उड़ गयी
मुझे पता ना चला
तुम्हारे जाने के बाद मैं तुम्हे ढूँढता रहा
जब भी दिखाई देती कोई तितली
मैं पीछा करता उसका
और इसी कोशिश में  मैं कितनी बार गुमशुदा हो चुका हूँ
मुझे अब भी पता नहीं की कहाँ हूँ मैं
पर जहां भी हूँ मैं
वहाँ एक चाँद है
जिस पर तुम बैठी हो
चरखे से  सूत कातती हुयी
और शायद सुन रही हो मेरी बातें ध्यान से
मेहरूनिसा अगर तुम सुन चुकी हो सबकुछ
तो मेरी एक ख्वाहिश पूरी करना
मैं कल एक बेदाग़ चाँद देखना चाहता हूँ

अराहान
4 Aug 2012








शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

खिड़कियों से झाँककर देखे गए सपने


खिड़कियों से झाँककर देखे गए सपने
सपने नहीं होते
ये हकीकत का ही हिस्सा होते है
इन सपनो में नहीं दिखाई देती है खूबसुरत परियां  
ना ही कोई उड़ने वाला घोड़ा दिखाई देता है
खिड़कियों से झांककर दखे गए सपनों में
एक नाला होता है
एक गंदा सा, रुका सा नाला
जिसके किनारे बैठ के रोता है एक छोटा बच्चा
शायद इसलिए क्यूंकि खो चुका होता है उस बच्चे के एक सिक्का
और उस एक सिक्के के खोने से खो जाती है उस बच्चे की खुशियाँ
खिड़कियों से झांककर दखे गए सपनों में
दिखाई देता है एक बुढा बरगद का पेड़
जिस पर एक गौरय्ये का जोड़ा बना रहा होता है एक घोसला
तिनका तिनका चुनकर लाते इन परिंदों को गुस्सा नहीं आता है तुफानो पर
टूटता नहीं है इनका हौसला
भले ही टूट जाता है हर बार इनका घोसला
खिड़कियों से झांककर दखे गए सपनों में
दिखाई देती है एक जद्दोहद
एक तड़प
एक दर्द
एक आकांक्षा
इन सपनो में दिखाए देने वाला रुका हुआ नाला भी इशारा करता है चलते रहने का
उस बच्चे के आंसू भी देते हैं हिदायत हमेशा हँसते रहो
टूटते घोसले भी सिखाते हैं संवरने का हुनर
खिड़कियों से झांककर दखे गए सपने,
सपने नहीं होते
ये होते हैं हमारे हकीकत का हिस्सा
जिसे हम आमतौर पर जिंदगी कहते हैं

ब्रजेश कुमार सिंह  अराहान”
3.08.2012