शनिवार, 22 जून 2013

यादें

जिन्दा हैं जेहन में अबतक वो  यादें
अबतक वो कहानियां
पहलु में जिनके बीता अपना बचपन, अपनी जवानियाँ
वो झांकती आँखों वाली खुली खिड़कियाँ
चाट पर टहलती मोहल्ले की लड़कियां
वो भेजना हमारा ख़त उनको
और मिटा देना सारी  निशानियाँ
जिन्दा है जेहन में अबतक वो यादें,
अब तक वो कहानियां
वो दांतों तले  ऊँगली दबाकर उसका मुस्कुराना
कागज़ के टुकड़े फेंककर प्यार जताना
वो उसके बाहीं में बीते पालो का जमाना
जैसे काँटों और फूलों का मिल जाना
याद आता है वो मंजर
याद आती हैं वो दिवानियाँ
जिन्दान है अब तक जेहन में वो यादें
अबतक वो कहानियां

अरहान


डर

डर 

बचपन से सिखाया गया था उसे 
किसी से नहीं डरना है 
किसी से भी नहीं डरना है 
किस हालत में नहीं डरना है 
किसी हथियार से नहीं डरना है 
वो निर्भीक बना 
किसी से ना डरा 
आगे बढ़ता रहा 
फिर एक दिन उसे प्रेम हुआ 
और उस दिन के बाद से वो डरने लगा 
दुनिया की तमाम बड़ी छोटी चीजों से 
दुनिया के तमाम उन लोगो से 
जिन्होंने कभी प्यार नहीं किया 

अराहान 

एक शाम




एक शाम 
जब दिन ले रही थी उबासी 
और रात कर रही थी जागने की तैयारी 
परिंदे लौट रहे थे घर को 
चुने हुए दानों के साथ 
पनिहारिनों की टोली लौट रही थी हाथों में मटके लिए 
पूर्व हवा के झोकों के बीच सूरज ले रहा था झपकी 
वो शाम लौट आने की शाम थी 
सब कोई लौट रहे थे वापस अपने घर को 
पर मुझे जाना था
तुमसे दूर 
तुम्हे अकेला छोड़कर, अपनी कविताओं के हवाले 
अपनी कसमों के बीच, हिफाजत से छोड़कर 
लौट आने के दिनों का वास्ता देकर 
मुझे जाना था 
एक ऐसे ही किसी शाम को 
तुमसे दूर 
दाने की तलाश में 

अरहान 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

क्षणिकाएं - 1

एक 

उस के   निकलती शराब की बू को
सूंघ लेते हैं लोग बड़ी दूर से
खोजी कुत्तो की तरह
पर उसके जलते दिल की तीखी गंध को
कोई महसूस नहीं कर पाता

दो 

ऊपर आग है
नीचे समंदर
बीच में है हम दोनों
थोड़े जलते हुए
थोड़े डूबते हुए

तीन 

हम दोनों ने उस समय प्यार किया
जब आस पास रोज बन रहे थे नए नए तालिबान
रोज एक कारतूस खरीदी जाती
हमारे सीने में उतारने के लिए
रोज एक नया फतवा जारी होता हमारे नाम
रोज एक शरियत नाजायज बताती हमरे इश्क को
पर हर रोज हम सांस लेते
मस्जिद में गूंजने वाले अजान की तरह

चार 

तुम्हारे इश्क में पड़ने का मामला
दुनिया ने इतना संगीन बनाया
की कभी  तुम्हे इजराइल
तो कभी मुझे फिलिस्तीन बनाया

पांच

समय के गर्भ में
गहराई तक धंसे हुए हैं
सुनहरे स्मृतियों के जर्जर अवशेष
जितना अन्दर जाता है वर्तमान का फावड़ा
यादों का एक हसीन टुकड़ा निकल आता है
जिसे मैं आंसुओं से धोकर
पोंछ देता हूँ  मुस्कराहट के  से रुमाल से
और रख लेता हूँ अपने जेब में वो टुकडा
आने वाले कई वर्षों तक रोने के लिए, मुस्कुराने के लिए

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

बदलाव

उनकी नजरो के जबसे हैं  शिकार बने
तबसे मर्ज-ए -मोहब्बत में हैं बीमार बने 
वो पलट के पूछते भी नहीं हाल हमारा 
हम ही मरीज और हम ही तीमारदार बने 
हंटर चला देती हैं हम पर इनके जैसी शोख हसीनाएं 
बेशर्म हम हैं जो इन जैसो के आशिक हर बार बने 
जबसे शौक़ चढ़ा है उनको रंगीन चुन्नियों का 
तबसे हम खुद में ही एक मीना बाजार बने 
मुस्कुराकर कभी जिसने हमको देखा भी नहीं 
हम  है की उनकी मुस्कराहट के तलबगार बने 
जबसे पिया है एक कतरा उनके शरबती आँखों का 
तबसे हम हैं आबशार बने 
रात दिन है आस की वो आएंगे करीब 
घर की चौखट पे खड़े खड़े हम चौकीदार बने 
सुनायी देती है कानो में जबसे उनके सांसो  की मौसीकी 
उनके सरगम में उलझे हम सितार बने 
छीनने लगी हैं वो छनकाके  पायल, करार हमारा 
उनकी कदमो की आहट  सुनकर हम बेकरार बने 
इश्क के अंजुमन में ऐसे हुए हम गिरफ्तार 
की काबिल से बेकार बने 
ऐसा लुटाया हमने उनपे अपना सबकुछ 
दुनिया की बात छोडिये हम खुद के है कर्जदार बने 
इतनी मोहब्बत , फिर भी हासिल कुछ नहीं 
हम  चाइनीज  सामानों के खरीदार बने 
"एकतरफा इश्क " शीर्षक से छपी एक कहानी 
हम कहानी के एक अहम् किरदार बने 
डूब गए गुमनामी के समंदर में 
इश्क में हम जो इतने वफादार बने 
वो बेखबर मेरे इश्क से, माशूका बन गयी किसी और की 
और हम देवदास के दिलीप कुमार बने 

अराहन 



वापसी

लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली में 
जहाँ वर्षों से मेरे इन्तेजार में खड़ा है एक खंडहरनुमा घर
अपने खिडकियों में कुछ बेचैन आँखों को टाँके हुए
अपनी दरकती दीवारों में टूटने का सबब संभाले हुए
लौट जाना चाहता हूँ मैं फिर से उसी गली में
मैं लौट जाना चाहता हूँ फिर से उसी घर में
जिसके अहाते में चावल चुन रही एक बूढी औरत चौंकती है कौवों की कांव कांव पर
उसे अबी भी यकीन होगा इस कहावत पर की
"सुबह का भुला लौटता है शाम को"
और इसी लिए हर शाम दिया रख जाती होगी दरवाजे पर
मैं लौट जाना चाहता हूँ उसी घर में
जिसके कमरे में एक बूढा
अख़बार में ढूंढ रहा होगा गुमशुदा लोगों की फेहरिस्त में किसी का नाम
और खुद को दे रहा होगा तसल्ली की
दुनिया के किसी कोने में जल ही रहा होगा उसके घर का चिराग

अराहान 

आजादी

हमलोग जेल की दीवारों पर
लिखते रहे खून से  आजादी की कवितायेँ 
जेल के रोशनदान से भेजते रहे 
आजाद हवाओ को प्रेमपत्र 
हाथो में जडी लोहे की बेड़ियों से भी की हमने 
अपने आजाद दिनों की बाते 
दीवाल पर रेंगती छिपकलियों को भी हमने बताया 
की 6X 8 के इस तंग कमरे में भी ढूंढा जा सकता है एक आजाद कोना 
एक अपना कोना जहाँ हम गुलाम होते हुए भी जाता सकते हैं अपना स्वमित्व 
जी सकते हैं एक बादशाह की तरह इस काल कोठरी में 
हम लोगो बीस साल जेल में कैद नहीं थे 
यूँ कहें तो हम लोगो ने जिया था उन बीस सालो को 
एक आजाद पंछी की तरह 

अराहान 

26 दिसंबर 2012