एक शाम
जब दिन ले रही थी उबासी
और रात कर रही थी जागने की तैयारी
परिंदे लौट रहे थे घर को
चुने हुए दानों के साथ
पनिहारिनों की टोली लौट रही थी हाथों में मटके लिए
पूर्व हवा के झोकों के बीच सूरज ले रहा था झपकी
वो शाम लौट आने की शाम थी
सब कोई लौट रहे थे वापस अपने घर को
पर मुझे जाना था
तुमसे दूर
तुम्हे अकेला छोड़कर, अपनी कविताओं के हवाले
अपनी कसमों के बीच, हिफाजत से छोड़कर
लौट आने के दिनों का वास्ता देकर
मुझे जाना था
एक ऐसे ही किसी शाम को
तुमसे दूर
दाने की तलाश में
अरहान

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