शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

एक गजल



दूर आसमान में जंवा हो रहा एक चाँद
इधर जिंदगी का सूरज ढलता जा रहा है

कोई इत्तेलाह उन्हें भी कर दे की 
उनको पाने का ख्वाब दिल में पलता जा रहा है

हम इसी फिराक में हैं की शाम ढलने से पहले घर को जाएँ
इधर वक्त का पहिया बढ़ता ही जा रहा है

खुद को बनाने की कोशिश है कैसी
जो सबकुछ अपना बिगडता जा रहा है

हम अपनी बात उसे बताएं कैसे
वो अपनी ही कहानी कहता जा रहा है

उसको पुकार रहें हैं हम कितनी देर से
 वो है की अपनी धुन में चलता जा रहा है

ऊपर आसमान बाहें फैलाये खडा है
पंक्षी पिंजड़े में तडपता जा रहा है

कोई खोल क्यूँ नहीं देता ये पिंजडा
पंक्षी के दिल में बगावत का शोला भडकता  जा रहा है

अब नहीं याद आते है दादी नानी के किस्से
जवानी की दहलीज में बचपन बिछड़ता ही  जा रहा है

ढल जायेगा सूरज यूँ ही, रास्ता दिखा दे उसे अरहान
मंजिल की तलाश में मुसफोर भटकता ही जा रहा है

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान'


गुरुवार, 3 मार्च 2011

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई
फिर क्यूँ होता है ये दंगा फसाद 
मासूमों के जीवन में क्यूँ आता है अवसाद 
क्यूँ रक्तरंजित हो जाती है तलवार 
क्यूँ ये करते हैं एकदूजे पे वार 
क्यूँ तोड़ी जाती हैं मंदिर की दीवारें 
क्यूँ गिराई जाती है मस्जिद की मीनारें 
क्यूँ चली थीं सन ८४ में नफरत की हवाएं 
क्यूँ खून से रंगी थी साडी फिजायें 
क्यूँ निर्दयता का था हुआ उत्थान 
क्यूँ आस्तित्व में आया खालिस्तान 
क्यूँ धरती का स्वर्ग, बना था नर्क
इंसानों और हैवानों के बीच का मिट गया था फर्क
क्यूँ जले थे लोग गोधरा की आग में 
क्यूँ गा रहे थे लैब कट्टरता के राग में 
क्यूँ लाहोर अमृतसर के बीच चली थी लाशो की रेल 
दूधमूहों के भी सर कलम कर दिए गए 
क्यूँ हुआ धड़ल्ले नृशंसता का खेल 
क्यूँ ये बने एक दूजे के कोप का भाजन 
फिर क्यूँ हुआ इस देश का विभाजन 
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई 
फिर कहे का ये दंगा फसाद 

जिसके हाथ में है सृजन-संहार 
जिसने किया हममें प्राण का संचार 
जो हमें संकटों से बचाता है 
क्या भला उस पे भी संकट आता है 
फिर काहे का ये 'जेहाद' 
फिर काहे का वो धर्म युद्ध है जिसकी बुनियाद 

उपजी इस तबाही से हम अभी तक नहीं उबरे हैं 
बदन के जख्म भर गए पर दिल के अभी तक गहरे हैं 
आँखों से नहीं, आंसूं अब दिल से रिश्ते हैं 
सियासत की चक्की में हम हर पल जो पिसते हैं 
पर इक दिन ऐसा आएगा 
नफरत बदलेगी मोहब्बत में 
घृणा द्वेष सब मिट जायेगा 
तब मिल जूल कर हम रहेंगे और 
और फक्र से कहेंगे 
की हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई 

ब्रजेश सिंह 
तारीख: १३ जनवरी २००८ 

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

मैंने कवितायेँ नहीं चुराईं

मैंने कवितायें नहीं चुराई है 
मैंने तो किसी का दर्द चुराया है 
एक बेसुरे दर्द को 
छंदों में सजाया है 
मैंने कवितायें नहीं चुराई है 
मैंने तो किसी का दर्द चुराया है 
बूँद बूँद गिरते आंसुओं को 
कागज़ पे उगाया है 
उभर आती है जो माथे पर परेशानियों की शिकन 
मैंने इसे शब्दों  के जंगल में छिपाया है 
गुमनामी की दलदल में दबी थी कुछ आवाजें 
मैंने इन आवाजों को एक गीत में गुनगुनाया है 
मैंने कवितायें नहीं चुरायी 
मैंने तो किसी का दर्द चुराया है 
दुनिया भर की मुश्किलों को 
अपने सीने से लगाया है 
मैंने कवितायेँ नहीं चुराईं मैंने तो 
किसी का दर्द चुराया है

ब्रजेश सिंह

ब्रजेश  सिंह 'अराहान'

बड़ी मुश्किलें है इस जमाने में

बड़ी मुश्किलें है इस जमाने में 
अरसों लग जाते हैं कुछ पाने में 
हम तो यूँ ही खुद को लुटा बैठे 
लोग कहते हैं कुछ बचा नहीं इस दीवाने में 

फूल खिलतें थे कभी हमारे भी आशियाने में 
शख्शियत थी हमारी भी किसी ज़माने में 
हमदर्द थी दुनिया भी हमारी तब 
आज कतराते है लोग हमारे पास आने में 

देर होने लगी थी अब उनके भी आने में 
इंतज़ार फिर भी कर लेते थे हम जाने अनजाने में 
उन्होंने अपनी वफ़ा का ऐसा सुबूत दिया 
अफ़सोस होता है हमें उनको भी आजमाने में 

सुकून मिलता है हमें अब खुद को छिपाने में 
खुशियाँ ढूंढता हूँ अब अफ़साने में 
खामोशी में  जीना सिख लिया है हमने 
महफिले सजती है अब वीराने में 

ज़िन्दगी बस्ती है अब मयखाने में 
कुछ मदद मिलता है यहाँ सबकुछ भुलाने में 
बुला ले ऐ खुदा मुझे अपने पास 
अब तू भी दिल न लगा मुझे तड़पाने में 

बदल गयी है तेरी दुनिया ओ उपरवाले 
सबकी ख़ुशी है अब कुछ ना कुछ पाने में 
आज हम भी खुश होते 
अगर कल खुश न होते 'लुटाने' में 

मौत जी लेते हैं हम ज़िन्दगी के बहाने में 
एक दर्द ही है जो साथ है हर पल 
दिल्लगी नहीं किसी की हमारे पास आने में 
अब तो बस धडकनों के थमने का इंतज़ार  है ऐ खुदा 
क्यूंकि बड़ी मुश्किलें है तेरे इस जमाने में 

ब्रजेश सिंह

जाने से पहले

ज़िन्दगी तुझसे अच्छा नाता रहा 
अपनी जिंदादिली तुझपे लुटाता रहा 
कभी तुने रुलाया, कभी हंसाता रहा 
मैं दर्द अपना सबसे छिपाता रहा 
अब वक़्त आ गया है जाने का
ऊपर एक नया आशियाँ बसने का 
तू देख लेना मुझे आसमां में बारिश के आने से पहले 
तुझको मैं अपना अक्स देता हूँ जाने से पहले 

ब्रजेश कुनार सिंह 'अराहान'

जूतें

जूतें मायने रखते हैं 
उस मोची के लिए 
जिसके लिए ये रोटी कपडा और मकान है 
इसकी उपस्थिति से सार्थक इसकी छोटी सी दूकान है 

जूतें मायने रखते हैं 
उन कोमल पैरों के लिए 
जिनकी रास्ते के पत्थरों और काँटों से होती है बैर

जूतें मायने रखते हैं 
उन तमाम बेटियों वाले गरीब पिताओं के लिए 
जिम्की 'पगड़ी' बन जाती है हमराही 
उन 'दो जोड़े' जूतों की 

जूतें मायने रखते हैं 
उस नौकर के लिए 
जिसकी माँ हफ्तों से होती है बीमार 
और वो मांग बैठता है अपने मालिक से 
बीच महीने में ही अपनी अगली  पगार 

जूतें मायने रखते हैं 
उस औरत के लिए 
जिसका पति पीता है शराब 
और वो चुपचाप सहमी रहती है 
क्यूंकि उसके बोलने से टूट जाती है 
उन दो जोड़े जूतों की चुप्पी 

जूतें मायने रखते हैं 
उन तमाम 'भरतों' के लिए 
जिनके लिए अहम होता है 
राम का पुनर्वास 

जूतें मायने रखते है 
उस भिखारी के लिए 
जिसको मिल जातें है फटे पुराने जूतें 
बिना इसके मांगने पर 
और कभी खा लेते है ठोकर इन्ही जूतों से 
पेट की आग बुझाने के खातिर 

ब्रजेश सिंह 

विनाश

रक्तरंजीत पड़ी है भूमि 
मृत्यु का ही पाश है
यहाँ वो मर रहा है 
वहां पड़ी उसकी लाश है 
यहाँ इस घोर तिमिर में 
रौशनी का पता नहीं 
शर्वरी का ही वाश है
यही तो विनाश है 

आज लालच लहरों की भाँती उफान पे है 
नैतिकता तो मरी हुयी शमशान में है 
वसुधा को तो जहन्नुम बना ही दिया है 
नजरे अब इनकी आसमान पे है 
मुहरो से घर पड़े है इनके 
फिर भी स्वर्ण की तलाश है 
यही तो विनाश है 

आज बुराई का बोलबाला है 
सच्चाई और अच्छाई को कबका मूक कर डाला है 
रोज लूट हत्या चोरी डकैती होती है 
हैवानियत के ठहाको के बीच इंसानियत रोती है 
सत्य अहिंसा दया इत्यादि का अब किताबों में ही निवास है 
यही तो विनाश है 

ब्रजेश singh
वर्ष २००७

(यह  कविता मैंने दसवीं कक्षा में लिखी थी, तन मेरे लिखना का सिलसिला शुरू ही हुआ था )