बड़ी मुश्किलें है इस जमाने में
अरसों लग जाते हैं कुछ पाने में
हम तो यूँ ही खुद को लुटा बैठे
लोग कहते हैं कुछ बचा नहीं इस दीवाने में
फूल खिलतें थे कभी हमारे भी आशियाने में
शख्शियत थी हमारी भी किसी ज़माने में
हमदर्द थी दुनिया भी हमारी तब
आज कतराते है लोग हमारे पास आने में
देर होने लगी थी अब उनके भी आने में
इंतज़ार फिर भी कर लेते थे हम जाने अनजाने में
उन्होंने अपनी वफ़ा का ऐसा सुबूत दिया
अफ़सोस होता है हमें उनको भी आजमाने में
सुकून मिलता है हमें अब खुद को छिपाने में
खुशियाँ ढूंढता हूँ अब अफ़साने में
खामोशी में जीना सिख लिया है हमने
महफिले सजती है अब वीराने में
ज़िन्दगी बस्ती है अब मयखाने में
कुछ मदद मिलता है यहाँ सबकुछ भुलाने में
बुला ले ऐ खुदा मुझे अपने पास
अब तू भी दिल न लगा मुझे तड़पाने में
बदल गयी है तेरी दुनिया ओ उपरवाले
सबकी ख़ुशी है अब कुछ ना कुछ पाने में
आज हम भी खुश होते
अगर कल खुश न होते 'लुटाने' में
मौत जी लेते हैं हम ज़िन्दगी के बहाने में
एक दर्द ही है जो साथ है हर पल
दिल्लगी नहीं किसी की हमारे पास आने में
अब तो बस धडकनों के थमने का इंतज़ार है ऐ खुदा
क्यूंकि बड़ी मुश्किलें है तेरे इस जमाने में
ब्रजेश सिंह