शनिवार, 22 जून 2013

कबाडखाना

बहुत कुछ जमा है
मेरे दिल के कबाड़खाने में
शीशें की डिब्बियां में बंद है
मेरे सपनों के टूटे हुए कुछ  पंख
दीवार पर टंगी  हुयी हैं
हसीं यादों की केंचुलिया
रंगीन पन्नों पर कहीं बिखरी हुयी है तुम्हारी मोम  सी बातें
खिडकियों में लटका हुआ है तुम्हारी यादों का मकडजाल
पुराने पलों की मकड़ियाँ अब भी पनाह लेती हैं इनमे
जमीन पर बिखरी पडी है तुम्हारे हाथों की टूटी चूड़ियाँ
उनको अब भी आता है हुनर चुभने का
अब भी जिन्दा ज़िंदा सा है तुम्हारा नाम
उस पुराणी डायरी में
अब भी ताजे ताजे से है तुम्हारे होठों के निशाँ
उन पुराने प्यालों में
जिनमे अक्सर हम दोनों चाय पिया करते थे
अपने आने वाले कल के बारे में बात करते हुए
किसी कोने में अब भी रो रहा है
हम दोनों का "आनेवाला कल"
जिसके रोने की आवाज दबी रह जाती है
मेरे आज के क्रूर ठहाकों के बीच
मेरे दिल में कभी तैर करती थी मीठे झील की मछलियाँ
पर अब खारे पानी का शार्क रस्क किया करता है इसमें

अराहान



 

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